तुम्हारे इश्क़ में
तुम्हारे इश्क में मेरा फ़ना हो जाना मुनासिब था
वफ़ा में बेवफाई का सबक मिलना नही भाया
ये तेरी एक अदा होगी दिलों से खेल जाने की
ढली एक उम्र फिर भी इस तरह न खेलना आया
टूटे फूटे खिलौनों से रिश्ता अपना है मुद्दत का
अजीजो से बेवजह मुझको नही मुंह मोड़ना आया
शुमार ये फलसफा शायद हो कल इश्क के सलीकों में
ऐसे मजमूं लिफाफों रख भेज सकना नही आया
किताब ए इश्क में रखा जतन से जो वफ़ा ए गुलाब
ख़िज़ाँ की मार सहकर भी न ही टूटा ना बिखर पाया
सींचते हैं नमक फिर भी न गले बाग मेरी वफाओं के
वो जितना तर हुए इसमें ,उन्हें उतना ही खिला पाया ,,,
प्रियंवदा
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