मिल जाते हो गीतों में तुम

मिल जाते हो गीतों में तुम
खो जाते एक ग़ज़ल बनकर
कब कैसे तुम्हें सहेजूँ अब मैं
रह जाओ तुम मेरे बनकर ....

किस सुर से तुम्हें सजाऊँ मैं
कहो कौन रागिनी गाऊँ मैं
शब्दों लूँ आज रिझा तुमको
ठहरो जो एक भाव बनकर....

दिन बनो चांदनी से शीतल
निशि चन्द्र झरो तपन लेकर
प्रति क्षण ही रंग बदलते तुम
नव रूप हृदय नित ही धरकर....

सावन कभी सौंप गये पतझर
फागुन गुलाल अंगों मलकर
आये आकर चल पड़े त्वरित
ऋतु भाव पृथक अंतस में भर .....

जो कहो हूँ चन्दन तुमसे ही हूँ
बन कुंदन तनिक दमक मैं लूँ
उस चरम तपाओ ना जी भर
बरसूं झमझम फुहार बनकर .....

प्रियंवदा अवस्थी

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