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प्यास बाकी है

लम्हा लम्हा कुछ बीत रहा है मुझमें लम्हा लम्हा कुछ रीत रहा जीवन से जीत पाया न भरम उम्र एक करते तमाम कि लौट आओगे तुम दर्द भरी आहें सुनकर पल गुजरते गए जैसे दिन भी यहाँ कई गुज़रे दिनों का थामकर दामन बरस बरस गुज़रे ज़िन्द ठहरी रही मगर ये उम्र भला कब ठहरी  जिस्म की कोख तपिश रख गयी झुरियां गहरी राह कोई किसी भी मोड़ पर ठहर कर तुम फिर से आहट मेरे कदमों की जान लोगे तुम वक्त की चाक पर ठहरी हुई मिट्टी की तरह कांपते जिस्म को बोलो क्या थाम लोगे तुम बुझती नज़रें हैं ज्योत डगमग है बहुत जीवन की  आस की आँख में तिनके सी आँच बाकी है खोए पाए की फिकर ना ही कुछ मिला न मिला गम तेरी यादों का औ अधूरा साथ काफी है.. .. जिस्म खोखल पांव डगमग भीतर भरम  नही   सफ़र ए ज़िन्दगी अभी तेरी तलाश बाक़ी है,,,,, मुद्दतें गईं उन गलियों चौरस्तों को मिले बिछड़े  संग चलने की तेरे फिर भी प्यास बाक़ी है. प्रियंवदा अवस्थी

नयनो से उसका टकराना

नयनों का उससे टकराना रग रग हरियाली भर जाना मादकता भर उड़ चले पवन अंग अंग बसंत इक खिल जाना सिकुड़े ठिठके सब उठे लहक डालों नव अंकुर पड़े चिटक रस गन्ध सहित झूमा गुलाब इतराती धरा, अंगड़ाय रुआब चौखट दस्तक, लाया वसन्त तरुणाई खिली छाया वसन्त कलियों का तन पल्वित होना हृद -मध्य मचलता सा सोना खगकुल जोड़े ,मधुमास रचे और वसुंधरा नव बीज पके अति दिव्य प्रीत ऐसी अपनी अर्पण बस जिसकी रीत घनी  करतब, यह दृष्टि दशाओं का ऋतु तो बस खेल ,हवाओं का जित फिरे नयन यह उधर चली कभी बरखा बन कभी शीत ढली प्रियंवदा अवस्थी