प्यास बाकी है
लम्हा लम्हा कुछ बीत रहा है मुझमें लम्हा लम्हा कुछ रीत रहा जीवन से जीत पाया न भरम उम्र एक करते तमाम कि लौट आओगे तुम दर्द भरी आहें सुनकर पल गुजरते गए जैसे दिन भी यहाँ कई गुज़रे दिनों का थामकर दामन बरस बरस गुज़रे ज़िन्द ठहरी रही मगर ये उम्र भला कब ठहरी जिस्म की कोख तपिश रख गयी झुरियां गहरी राह कोई किसी भी मोड़ पर ठहर कर तुम फिर से आहट मेरे कदमों की जान लोगे तुम वक्त की चाक पर ठहरी हुई मिट्टी की तरह कांपते जिस्म को बोलो क्या थाम लोगे तुम बुझती नज़रें हैं ज्योत डगमग है बहुत जीवन की आस की आँख में तिनके सी आँच बाकी है खोए पाए की फिकर ना ही कुछ मिला न मिला गम तेरी यादों का औ अधूरा साथ काफी है.. .. जिस्म खोखल पांव डगमग भीतर भरम नही सफ़र ए ज़िन्दगी अभी तेरी तलाश बाक़ी है,,,,, मुद्दतें गईं उन गलियों चौरस्तों को मिले बिछड़े संग चलने की तेरे फिर भी प्यास बाक़ी है. प्रियंवदा अवस्थी