पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां
सुनो प्रिय....
पतझर ओढ़ते हुए मौसम में
बूढ़े होते कुछ दरख्तों पर
जवानी की अनगिनत फुनगियां
एक बार फिर निकल पड़ी हैं.....
नन्ही नन्ही कोपलों की आपस में
कनखियों खुसफुसाने की
चिरपरिचित सांसारिक कला
बहुत कुछ अबोले ही बयान कर रही है....
बहारों के हर रंग का आस्वादन कर
परिवर्तन में परावर्तन को
समझने और समझाने का
ज्यों पुनः समय आने को है ....
दिन रात और दिन के फेर के
सत्य को स्वीकारने की घड़ी,
उथलपुथल भरे मन के मौसम में,
घर आँगन और दहलीज के अलावा
कहीं भी इतने गहरे सन्नाटे नही होते...
जब बाहर की घुम्म से बेचैन होकर
भीतर की त्राहि बेतहाशा शोर करती हो...
समय की तयशुदा डगर पर चलकर
पुरानी हुई हड्डियों की संधियों का
आपसी घर्षण, और शोर ,
देह की निपात और सन्निपात की
हर स्थिति परिस्थिति से जूझकर
सारी दैहिक ऊष्मा बटोर
जंगल जंगल भटकती हुई प्रतीत होती है....
कर्म धर्म का पथ बुहार चेतना
अंततःजंगली घास के
सूखे ढेरों पर ठहर
सावन की गीली सीली
मिट्टी के मोहक आलिंगन में
अपना पोर पोर भिगोकर
ज्यों उर्वरा बन जाना चाहती हैं......
जैसे बतलाना चाहती हो जग को
बौराये बचपन के मस्तानेपन
के साथ जीभर खेलकर
गदराई हुई प्रौढ़ देह की
छाया के नीचे निर्विवाद
समस्त सांसारिक उत्तरदायित्व पूर्ण कर,
अन्ततः अपनी ही शाखों से
अलग होकर , अस्तित्व का
बदशक्ल, बेरंग और बेमायने हो जाना
इति नही होती किसी जीवन की.....
वस्तुतः यही से आरम्भ होती है
नव निर्माण की संकल्पना....
करता है एक मन जब
नूतन अथ की सुंदर संवरणा...
प्रेम के पादप का पुनः अंकुरण करने को
किसी देह का विजातीय हो जाना
मरण कदापि नही होता...
कई बार यह सब
किसी अजन्मे जीवन की
मनमाफिक फसल उगाने को
उर्वर भूमि तैयार करना भी हो सकता है.....
प्रियंवदा अवस्थी
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