जब कोई तृष्णा ही न रही

क्यों रुक नही जाती ये सांसें...
क्यों ये दिल अब थम नही जाता
क्यों बुझ नही जाती ये आँखें
क्यों ये तड़प ये ग़म नही जाता...
पड़ी हूँ गुमशुदा सी, उससे बिछड़
अपने ही बसाये एक शहर में,
ओ आसमां की बुलंदी पर
उड़ते हुए पंछी....
अब जो निष्प्राण हो चुका ये तन
प्रियतम बिना...
नोच लो मेरी इन आँखों को
ताकि कोई और छवि न देख सकूँ
छलनी कर दो इस हृदय को
कि अब कोई स्पंदन न सुन सकूँ
चुन लो कतरा कतरा इस पिंजर को
ताकि कोई और अब स्पर्श न कर सके
करुँगी क्या अब मैं इन्द्रियों का
जब कोई तृष्णा ही न बाकी रही
उस प्रिय के साथ एक लमहा
ज़िन्दगी गुज़ार कर...
प्रियंवदा अवस्थी

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