हौसले तो साथ होते
वक़्त ए ज़रुरत थी कि हौसले तो साथ होते
मेरा सर होता तेरे काँधे तो कुछ और ही असर होते ..
टूटते तेरे पहलू में तो बात ही कुछ और थी
तन्हाइयों में खुद की हम यूँ हथेलियाँ न भिगोते
शिकवा करें ,कहें हम बता ये हाल ए दिल कहाँ
होते किधर हो अब तुम होने का है बस गुमाँ..
सांसें हैं रौंदती हमें फिर फिर तबाह करते
आँखें छलक रही हैं रुख ए इंतज़ार होके ...
किस्सा ए शब ए गम कहें या दास्ताँ ए उल्फत
लुट पिट रही ये ज़िन्दगी कटी पतंग होके ..
कि लौट आओ अब ये दर ओ दीवार ढह न जाये
दो दिल मिहब्बत में दो दिल ही रह न जाएँ ...
प्रियंवदा
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