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तब जाकर आते हो प्रिय

पखवाड़ों दर पखवारो क्या कुछ न सहेजती है जब स्याह रात तब जाकर आते हो तुम प्रिय कहीं चाँद लेकर अपने हाथ ।। और तुम कहते ये छोटी बात,,,, क्या जानों तुम पीड़ाएँ तृण तृण से अंधकार पीने की जीवन साधन सुलभ, असह्य पीड़ा तुम बिन जीने की दिन काटे पोरों को गिनते कटी है कैसे बिरहन रात और तुम कहते ये छोटी बात,,,,, धुन धुन बदरा काती कपास जब दिन के तीन पहर झिलमिल कोरों स्वप्निल बूटे काढ़े हैं दिन दिन भर हृदय दाह ठिठुरी काया नयन झरी बेमौसम बरसात और तुम कहते ये छोटी बात,,,,, एक छाप होती जो तेरी तब भी अपनी निभ जाती  एक सजीली चादर मन के छत आँगन ढक जाती तुम को नित ही  रूप बदल मिलना भाया धूप छाँह से लड़ भिड़ कर ही  तुमको पाया किस किस राह चली निशा तब आई उजेरी रात और तुम कहते ये छोटी बात,,,,,,

रंग रंग के रंग

सुनो मुझमे बसने वाले मेरे तुम खुशियों का रंग कभी देखा है तुमने? फिर कहते हैं लोग उसे  कभी सुर्ख तो कभी गुलाबी  कभी हरी तो कभी इंद्रधनुषी वस्तुतः खुशियों का कोई रंग नही होता फिर भी वे सतरंगी कही जाती है..... क्या पीड़ा का रंग कभी देखा है तुमने? देखा तो कभी मैनें भी नही किन्तु पीड़ा को अँधेरों के कांधे ढुलक  आपस में एकरंग होते अक्सर महसूस ज़रूर किया है........ मन के कोरे केनवास पर सुख दुःख हर्ष उल्लास और शांति के तयशुदा या मनभावन रंगों से अजब गजब चित्रकारियां करते रहे हो तुम चेहरे पर सहज, कुदरती मुस्कान लिए होठों को सुर्ख गालों को गुलाबी ओढ़नी को धानी घाघरी को बसंती सांझ और सुबह को सुनहरी रंग दिया है तुमने,,,, आसमान में साँसों सी गहराई  का और समंदर की लहरों पर  उफान का फेनिल रंग  चढ़ाते देखा है कितनी ही बार तुम्हें..... रंगों के रूप और असल मायने  तुमने ही तो समझाए हैं मुझे सावन में लहलहाते खेतों के बीच बैठकर पुरवा के झोंकों से बिखर गई  लट को मेरे माथे से हटाते ही  कैसे छम से उतर पड़ती थी नभ से सुख के सात रंगो की रश्मियां.... धरती को अपने मोहपाश में आ...