Posts

Showing posts from July, 2017

उजड़ी नींदों का सफर भी

उजड़ी नींदों का सफर भी फ़िर सुहाना हो गया। गुज़रा यूँ छूकर वो पलके कि दीवाना हो गया।। करवटों पर लिख रहा था जब दर्द कुछ इबारतें । सिलवट ए मन खोलते वो तो परवाना हो गया ।। ख्वाब हो ह...

सताए को दुनिया क्यो सता जाती

अटक राहों टिकी नज़रें भटकता मन विकल मेरा ज़माने की लगी बंदिश बड़ा ज़ालिम है यह पहरा मिलन मन जागते ही झट कुचल देती तेज़ धड़कन नमी आंखों की पीते हैं  छुपाते सबसे रंज और ग़म वो एक जो छाँ...

चुराया जिस अदा से दिल

कभी नादानियाँ भाती कभी जी भर सताती है ।। कभी मन गुदगुदा जाती बेवजह भी रुलाती है । ये कैसी प्रीत है उसकी लड़कपन मुंह चिढ़ाता है किसी पल चाँद दे जाए तो दूजे छीन जाता है ।। हथेली पर सितारे रख कभी मुस्का गया झिलमिल पसारी चाँदनी छत पर चुरा कर ले चला चुन बिन।। फूंककर गम के बादल को नज़र ने चूम ली पूनम । बहाना ले अमावस का अंधेरे रख गया तिन तिन ।। खेल रूठने मनाने का उसको बेहद लुभाता है । इश्क मशहूर है उसका जो जीभर जी जलाता है ।।  माथ सिलवट शिकन को देख पल में सहम जाये वो। सबर आँखों जो झर जाए तो खुद से रूठ जाए वो।। कहूँ अब और क्या प्रिय तुम ये जुल्मी खेल मत खेलो । चुराया जिस अदा से दिल उसी से जान भी ले लो ।। प्रियंवदा अवस्थी