कभी नादानियाँ भाती कभी जी भर सताती है ।। कभी मन गुदगुदा जाती बेवजह भी रुलाती है । ये कैसी प्रीत है उसकी लड़कपन मुंह चिढ़ाता है किसी पल चाँद दे जाए तो दूजे छीन जाता है ।। हथेली पर सितारे रख कभी मुस्का गया झिलमिल पसारी चाँदनी छत पर चुरा कर ले चला चुन बिन।। फूंककर गम के बादल को नज़र ने चूम ली पूनम । बहाना ले अमावस का अंधेरे रख गया तिन तिन ।। खेल रूठने मनाने का उसको बेहद लुभाता है । इश्क मशहूर है उसका जो जीभर जी जलाता है ।। माथ सिलवट शिकन को देख पल में सहम जाये वो। सबर आँखों जो झर जाए तो खुद से रूठ जाए वो।। कहूँ अब और क्या प्रिय तुम ये जुल्मी खेल मत खेलो । चुराया जिस अदा से दिल उसी से जान भी ले लो ।। प्रियंवदा अवस्थी