कि बार बार लगातार मुझसे ही सिर्फ एक ही प्रश्न मेरा कि कौन वो मेरा .. क्या है ये नाता गहरा कि दिखे वो मेरा हो मुझमे ही हर सीरत से गुज़र हर सूरत में ठहर, ये उसका बार बार कुछ छूकर गुज़र ...
तुम !!! मुझमे समाहित एक समन्दर कितनी ही बार तपते उमसते ढलके हो इन नयनो से हो अधरों तक.... कितने ही घूंट खारे पिए ताकि उर्वर रहे ये ज़मीन जब तब ढलकते फिसलते तो सीले फफूंदे खलिहान हो...
एक चादर हुई झीनी तो क्या कोई ग़म मत कर यार उस पार जुलाहा बैठा है और हम आये मझधार, मैल कुचैली फटेहाल अब ये कैसी भी है धोहु पखारू ओढ़ ढाँक ये सूरत कैसी भी है दिन दोपहरी साँझ रात हो...
कि कुछ गुनगुनी ये हवा हो चली है महक सी उठी है गली आज दिल की हुई शोख ऐसी निगाहें निगाहों कि नीयत बदल ही गयी क़ातिल की लगी को जलाकर शबें की थी रोशन बिछाते रहे ख्वाब के हम बिछौने आय...
सच!! कितना मुश्किल है उसे उसकी कीमत समझाना उतना ही उसे समझ भी पाना नादां ठहरी , ये निगोड़ी कब हुई भला किसी में थोड़ी... भाये इसे बस तन पर ही इठलाना भरमाना,रीझना और रिझाना बेसबब बेब...
महानता कब हुई यहां युगों की मोहताज़ तुम भी रच सकते हो एक रामायण आज राम और सीता किसने कहा- कि इनका युग बीता? भरत और लक्ष्मण आज भी कर सकते हो तुम ऐसे किरदारों का अनावरण कारण ये कि ...
कितने ही वर्तमान स्वाहा किये हमने और तुमने, कल को सोचकर पुनश्च कल की सोचकर बैठकर क्षितिज की कोर पर दोनों तरफ रखी हुई, ज्वलनशील समिधाओं के मध्य मन्त्रमुग्ध से शरीर , और सम्म...
उस एक टीले पर, जहाँ हम और तुम मिला करते थे अक्सर... बेमौसम, बेसबब हवाओं से बतलाते मौन तोड़ते, फिर चुप जाते... सूरज चाँद से छिपते छिपाते आँखों में आँख डाले हाथों में हाथ थामे,,, दूर तक ...