कहो क्या ऐसी कोई प्रीत रीत ----------------------- सज धज वो डोली आई थी लाखों अरमान संग लायी थी एक छोर लहू को रख सहसा एक डोर बंधी चली आई थी कहो क्या ऐसी कोई प्रीत रीत तुमने भी कभी निभाई थी एक माटी से ...
मन निकल गया उस पार बिसरे हुए कुछ प्रेम गीतों की धुन उनसे हुई दूरियों नापते हुए मन करते कितने ही श्रृंगार निकल गया फिर से उस पार लगा झूलने सहसा ही वो पकड़कर इंद्रधनुष की डो...
क़ाबिलियत शब्दों में नही भावना में होती है एक दिन उसने कहा था मुझसे काबिलियत शब्दों में नही उनमे लिपटे भावों में होती है दरअसल भावनायें ही कविता की असल जननी होती है जीवन ...