यादों की अगर कहीं बिकवाली हो पाती

जो यादों की अगर कहीं बिकवाली हो पाती
तो अपने ग़म की झोली कुछ ख़ाली हो जाती ।।
बिक जाती है जहान में तो हर चीज सरेआम
बोली भी लगा देते यहां कुछ लोग खुले आम ।।
बिकते रहे रिश्ते जा बेघर भी हुए मकान
खुशी की चाह में क्या कुछ न हुआ नीलाम।।
नाते बिके बातें बिकी रातें बिकी यहां तो
बिकते रहे तनमन यहां हर रोज़ सुबहो शाम ।।
मैं खड़ी बाजार में कुछ यादों को सर उठाये
ढेरियों से वक्त की कोई एक याद तो उठाये ।।
आया न खरीदार कोई एक याद तो उठाता
देता न कोई मोल सही बेमोल ही ले जाता ।।
बैठे हैं सुबह से हम लो अब तो शाम हो गयी
मेरे आस पास डगरें माफ़िक शमशान हो गयी ।।
हर शै बिकी दुनिया में एक याद जो बिक पाती
तो अपने भी ग़म की झोली कुछ खाली हो जाती ।।
प्रियंवदा

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