फिर वो चढ़ा जब साँझ की अटारी
आज ....
फिर जब वो चढ़ा , साँझ की अटारी....
चुन चुन कर शरारते करारी....
ठहरा जा आँगन की मुंडेर...
फिर मुझसे आंखमिचौली,
फिर फिर वही ठिठोली,,,
पलकों...ढलती रातों सी नींद
तो रातों चढ़ती उसकी शरारतें...आदतन....
चितचोर,बहरूपिया ,निर्मोही
न जाने कितने ही नाम दे डाले शिकायतन....
चांदनी में नगीने गढ़ता रहा
वो सारी सारी रात....
कल हार पहना गया था चुपके से
तो कंगन दिखला इठलाया
वो आज...
झूठे सच्चे से नखरे दिखाते
मुंह फेरते.....कुछ कुछ लजाते...
अंधियारे कब फिसल गए न जाने,
भोर ..ओस से भीगे बाल समेट
मुस्काया जो जीभर निरख
माथ सोने की बिंदिया सा
फिर दमक उठा सिरहाने.....
प्रियंवदा अवस्थी
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