गति ही जीवन की नियति
एक सुहानी सुबह...मैंने देखा तुम्हें ...
तुम! तेजस्वी मुस्कान लिए
स्वागत कर रहे थे ..एक नई भोर का..
और मैं अचरज से अपलक
निहारती रही सिर्फ तुम्हें...
कुछ जागी कुछ उनींदी आँखों
बस यही सोचते .
कि काश ये पल..शीतल ..कोमल..
यहीं ठहर जाये अब जीवन में...
और क्रूर दोपहरी दस्तक भी न दे
वियोगी पलों सी...
किन्तु तन्द्रा टूट जाती है
ये भास होते ही ..
जानती जो हूँ ये हो नही सकता
काल की गति को
भला कौन है जो रोक सका
कि गति ही जीवन की नियति जो है....
प्रियंवदा
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