अनुभव कभी बहते नही

अहसासों से लबालब
भरी हुई ये ज़िन्दगी
किसी एक पत्थर की
ज़रा सी नादानी से
क्यों है इतनी मायूस
क्यों आज इतनी बेचैन
पुराने से हो गए उसके बस्ते मे
परतों में संजोये हुए
ताजे बासे से ढेरों अनुभव
सब उसके अपने ही तो हैं
फिर दिन के ताप संताप हों
या रातों के उनींदे उन्माद
दोपहरी के चीरते सन्नाटे हों
या रिश्तों के मुनाफे घाटे
तह से सतह तक सब
अनुभव के ही तो अनुक्रमण
फिर आज मन पर कैसा
ये अप्रत्याशित अतिक्रमण?
पढ़ाया तो था बहुत पहले
शायद भूल गयी हो तुम
कि ठहरे हुए जल पर
पत्थर मारने की भी है एक प्रथा
देखो कहीं उसी बस्ते के ही
किसी कोने में दुबकी मिलेगी
समझाया तो था कितनी दफ़ा
अनुभव कभी बहते नही
सिमट जाते हैं वक़्त के साथ
गहरे भीतर,सतह में जाकर
लिपट जाती हैं जब
कुछ जीवंत संवेदनाएं
उनके वजूद के इतस्ततः
अहसासों की काली मिटटी से
उस दिन कोई नया कमल खिल उठता है':

(सबक की पुनरावृत्ति ही जीवन का अभ्यास कार्य )

प्रियंवदा अवस्थी

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