उड़ेगा मान लेकर तब तिरंगा

वतन आज़ाद हो अपना
हर कहर और जुल्मों से
दुआ चढ़ आसमाँ बरसे
भरे सागर नगीनों से
तरंगें हों उमंगें हो
रहे आज़ाद तन हर मन
सुनाई दे न अब कानों
कहीं कोई करूण क्रंदन।।

सुधा सीझी जुबाने हों
कटें वे रूढ़ियाँ जड़ जो
समन्वय के तराने हों
मनुजता का यही प्रण हो
भरे जब पेट अक्षम का
ज्ञान निर्मल बहेगा तब
पर्व आजाद होने का
मनाएगा स्वर्ण पूरब  ।।

त्रिवेणी संस्कृति अपनी
धरम के दृढ रहें स्तम्भ
न तेरा क्षुद्र न मेरा उच्च
मिटे हर द्वेष सारे दम्भ
तीन रंगों पे तब अभिमान
झुके सर गैर मुल्कों का
अहा भारत मेरा भारत
स्वरित हो कण्ठ से महान
झोपड़ों पर मीनारों पर
शहर के हर किनारों पर
उड़ेगा मान लेकर तब
गगनचुम्बी तिरंगा ध्वज

प्रियंवदा...

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