वक्त की नाज़ुक टिकटिकी

वक़्त की नाज़ुक टिकटिकी 
और घड़ी की पेंडुलम 
बड़ी जाबांजी से थामकर 
वो मेरा तुम्हारा
हथेलियाँ उलझाये हुए
क्षितिज की मुंडेर पर ,अक्सर,,,
बस यूँ ही बैठ जाना.... 
कितनी ही बार लगा मुझे कि
जैसे कुछ कहना है तुम्हें,,,
कितनी ही बार लगा
कुछ पूंछना है तुम्हें शायद,,,
इसी धरपकड़ में
फिसलन भरे वक्त का पेंडुलम
फिसल जाना,,,
और फिर क्या बस,,,,,
उलझी हुई सी हथेलियाँ
झुकी हुई सी नज़रें ....
पूरब और पश्चिम की चंचल
हवाओ की ढेरों अनकही
कहते हुए.....संग बहते हुए
मेरे तुम्हारे दरमियान,,
वक़्त की नाज़ुक टिकटिकी की
हर आहट अनदेखी अनसुनी करते
बस यूँ ही ,कितनी ही बार,,,,,

प्रियंवदा अवस्थी

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