एक आस, बहुत वो प्यासी है
अँखियों ऊपर बैठी है जो
एक आस बहुत वो प्यासी है
लिख देते तुम आंगन सावन
ये तनमन आज भिगो लेते ।।
भीगी सीझी इन पलकों पर
सीले सीले दो स्वप्न बिंधे
पुरवा संग जरा लिपट बहते
हम इनको तनिक हवा देते ।।
ठहर ठहर घुमड़े मन भीतर
एक बात वही जो कह न सके
जो बन तुम मेघ गरज़ उठते
कानों में वो बात बता देते ।।
सीली धरती सब राज कहे
तुम तक कैसे आ पाऊँ मैं
इतना तुम आज बरस पड़ते
बहकर तेरी चौखट आ लगते।।
प्रियंवदा अवस्थी
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