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Showing posts from 2023

तब जाकर आते हो प्रिय

पखवाड़ों दर पखवारो क्या कुछ न सहेजती है जब स्याह रात तब जाकर आते हो तुम प्रिय कहीं चाँद लेकर अपने हाथ ।। और तुम कहते ये छोटी बात,,,, क्या जानों तुम पीड़ाएँ तृण तृण से अंधकार पीने की जीवन साधन सुलभ, असह्य पीड़ा तुम बिन जीने की दिन काटे पोरों को गिनते कटी है कैसे बिरहन रात और तुम कहते ये छोटी बात,,,,, धुन धुन बदरा काती कपास जब दिन के तीन पहर झिलमिल कोरों स्वप्निल बूटे काढ़े हैं दिन दिन भर हृदय दाह ठिठुरी काया नयन झरी बेमौसम बरसात और तुम कहते ये छोटी बात,,,,, एक छाप होती जो तेरी तब भी अपनी निभ जाती  एक सजीली चादर मन के छत आँगन ढक जाती तुम को नित ही  रूप बदल मिलना भाया धूप छाँह से लड़ भिड़ कर ही  तुमको पाया किस किस राह चली निशा तब आई उजेरी रात और तुम कहते ये छोटी बात,,,,,,

रंग रंग के रंग

सुनो मुझमे बसने वाले मेरे तुम खुशियों का रंग कभी देखा है तुमने? फिर कहते हैं लोग उसे  कभी सुर्ख तो कभी गुलाबी  कभी हरी तो कभी इंद्रधनुषी वस्तुतः खुशियों का कोई रंग नही होता फिर भी वे सतरंगी कही जाती है..... क्या पीड़ा का रंग कभी देखा है तुमने? देखा तो कभी मैनें भी नही किन्तु पीड़ा को अँधेरों के कांधे ढुलक  आपस में एकरंग होते अक्सर महसूस ज़रूर किया है........ मन के कोरे केनवास पर सुख दुःख हर्ष उल्लास और शांति के तयशुदा या मनभावन रंगों से अजब गजब चित्रकारियां करते रहे हो तुम चेहरे पर सहज, कुदरती मुस्कान लिए होठों को सुर्ख गालों को गुलाबी ओढ़नी को धानी घाघरी को बसंती सांझ और सुबह को सुनहरी रंग दिया है तुमने,,,, आसमान में साँसों सी गहराई  का और समंदर की लहरों पर  उफान का फेनिल रंग  चढ़ाते देखा है कितनी ही बार तुम्हें..... रंगों के रूप और असल मायने  तुमने ही तो समझाए हैं मुझे सावन में लहलहाते खेतों के बीच बैठकर पुरवा के झोंकों से बिखर गई  लट को मेरे माथे से हटाते ही  कैसे छम से उतर पड़ती थी नभ से सुख के सात रंगो की रश्मियां.... धरती को अपने मोहपाश में आ...

मैं थी तुम थे

मैं थी , तुम थे संग संग उस क्षण मध्य खड़ी  तन्हाई थी जाने किस पथ चल कर वह  भीतर घर करने को आई थी,,,, अगल बगल कुछ कुछ टूटा था  समय बड़ा बेसुध बिखरा था  कजली थी कानो में गुंजित कंठ ग़ज़ल भर्राई थी खिले पुष्प शाखा से गिरकर झरे पात सावन से मिलकर स्वांस समीर मेघ आलिंगन द्युत दामिनि चुंधियाई थी देह अदृश थी भले चक्षु से मिले हृदय आलोड़ित हृद से  योग योगिनी  के सुयोग की मिलन कथा, युग युग वियोग की प्रेम प्रवाह धार बन अविरल  अंखियन से उफनाई थी प्रियंवदा अवस्थी

यहाँ कभी कभी

 #यहाँ  #कभी #कभी #ऐसा #भी #होता #है दुनिया की अनुभवी नज़रों में  अरसे से  आलिशान सा था जो एक घर ... गलती से खुली रह गयी  खिड़की के भीतर से कल  किसी एक मकान सा  झांकता दिखा वह विकल.... रेशमी दोहरनुमा मोटे पर्दे के उस पार टकटक ताकती  शून्य में लगातार   कोई टूटता सितारा आँकती दिखी सूनी सूनी सी नज़रें भी........ अँधेरे की मुँडेर पर आ बैठे चाँद के रक्तिम नैनों में चढ़ी सी दिखती खुमारी थी और वे नज़रे बड़ी ही काली  और बेहद कजरारी थीं ..... पर शायद .... उसके आसमान में कहीं  जरूर कुछ दरारें थीं..... शाम से गुलाबी होठों पर खूबसूरती से गढ़ी गयी थी  जैसे महीन कशीदेकारी..... ओढ़ रखी थी बदन पर उसने झिलमिल परम्पराओं की ओढ़नी  फुलकारी...... फूंक दी हो फिर किसी ने भी  मोहिनी उस स्तम्भित चरित्र पर छिड़क दिए हों कितने ही सोंधे इत्र नम हवाओं ने   उसपर... सावन में  टपकती हुई  छत माथे पर छलछला उठी बूंदे दीवारों से रह रहकर  उठती हुई वाष्प  कह रही थी बहुत कुछ  मौन होकर..... कि क्या कुछ न सुलग रहा होगा  कबस...

पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां

सुनो प्रिय.... पतझर ओढ़ते हुए मौसम में बूढ़े होते कुछ दरख्तों पर जवानी की अनगिनत फुनगियां  एक बार फिर निकल पड़ी हैं..... नन्ही नन्ही कोपलों की आपस में कनखियों खुसफुसाने की चिरपरिचित सांसारिक कला बहुत कुछ अबोले ही बयान कर रही है.... बहारों के हर रंग का आस्वादन कर परिवर्तन में परावर्तन को  समझने और समझाने का  ज्यों पुनः समय आने को है .... दिन रात और दिन के फेर के सत्य को स्वीकारने की घड़ी, उथलपुथल भरे मन के मौसम में, घर आँगन और दहलीज के अलावा कहीं भी इतने गहरे सन्नाटे नही होते... जब बाहर की घुम्म से बेचैन होकर भीतर की त्राहि बेतहाशा शोर करती हो... समय की तयशुदा डगर पर चलकर पुरानी हुई हड्डियों की संधियों का आपसी घर्षण, और शोर , देह की निपात और सन्निपात की हर स्थिति परिस्थिति से जूझकर सारी दैहिक ऊष्मा बटोर जंगल जंगल भटकती हुई प्रतीत होती है.... कर्म धर्म का पथ बुहार चेतना अंततःजंगली घास के सूखे ढेरों पर ठहर सावन की गीली सीली मिट्टी के मोहक आलिंगन में अपना पोर पोर भिगोकर ज्यों उर्वरा बन जाना चाहती हैं...... जैसे बतलाना चाहती हो जग को बौराये बचपन के मस्तानेपन के साथ जीभर खेलकर गदरा...

बहुत दूर चलना एकाकी

बहुत दूर  चलना एकाकी पथ चारों ओर अँधेरा । आ जाओ इक बार पुनः यह हाथ पकड़ लो मेरा ।। निज पग की आहट भी सुन मन भयभीत बड़ा है। परछाई सा तन ठिठका जड़ बनकर दीन खड़ा है ।। माना पथ दुर्गम था फिर भी बहुत सबल था साथ । निकल पड़े डग बदल अचानक तजकर मेरा हाथ।। क्या कमतरी रही जीवन क्यों मुरझा मन का फूल । संझा से सुर्खी छीनी निशि मांग भरी क्यों  धूल ।। पथ संगी सहसा सूझी क्यों मंजिल नई बनाने की। भूले वचन और वे सारी कसमें साथ निभाने की।। मूक अवाक खड़े तकते नभ शायद मुझे पुकारो । आलिंगन भरकर नयनों की आख्या नयन निवारो ।। प्रियंवदा

एक तुमसे जुदा होने के बाद

एक तुमसे जुदा होने के बाद  हर एक साँस सज़ा हो गयी यूँ ही साथ साथ चलते  न जाने क्या खता हो गई  कि दिल में हूक उठती है  ये आँखें रोज़ बहती हैं  फिसलती सी कुछ तारीखें तुम्हारी राह तकती हैं कहीं उस पार से तुम भी ये मंज़र तो देखते होंगे कहो कुछ न मग़र दिल की हर एक फरियाद सुनी होगी मैं इस जालिम ज़माने में तुझे अपना ना कह पाई यही ग़र एक खता मेरी सजा खुद मैंने अपनाई  मोहब्बत में ज़रूरी तो नही हर एक बात पूरी हो  और पूरी होने को एक  अदद हासिल ज़रूरी हो ।। प्रियंवदा अवस्थी

लौट आना बेफिकर

लौट आना बेफ़िकर जब भी तुम्हारा दिल करे तोड़ देना नींद तनहा ख्वाब से मिलकर गले ।।  मैं हर पल राह देखती हूँ । जब कोई आवाज़ सुनती हूँ ।। वो इक दर्पण जिसे हमने संग साथ था निहारा किसी इक स्याह लम्हे ने बेतरह तोड़ डाला ।। मैं वो  कतरे बटोरती हूँ । आँच से कांच जोड़ती हूँ ।। कूज कोकिल की बागों ढाई आखर बोलती थी। शहद जीवन का हरपल जो हृदय में घोलती थी। मैं वह झनकार खोजती हूँ । जब कोई परिंदा देखती हूँ ।। चली आती है खुशबू भूल भटके मेरे आँगन में। भिगो जाती है रग रग देह की मन के तड़ागों में ।। मैं वो हर बात खोजती हूँ  जब भी गुलाब देखती हूँ ।। बात कोई बड़ी छोटी समय की बात सब होती । सुलगते रिश्तों के चूल्हों जगत यह सेंकता रोटी ।। ये लिख तुम्हें रोज भेजती हूँ हवा जब मुड़ते देखती हूँ ।। प्रियंवदा अवस्थी©

सिफारिश चाँद से करना

बहुत तनहा रहा है वो सिफारिश इक चाँद से करना आज की रात उसके ख्वाबों की हिफाज़त करना ।।इन्हें चुन बीनते बरसों कई रातों वो जागा है सिरहाने की पिटारी में स्वांसों का धागा है ।। सजायेगा किसी एक दिन वो इनसे ज़िन्दगी अपनी बहुत टूटा बहुत बिखरा कर ले मन की कुछ अपनी  सुनो तुम ए घटा उससे ठिठोली बस आज मत करना बहुत तन्हा रहा है वो .....

अधूरा ग्रंथ

अतीत के पन्नों से ..... सन १९८५  में लिखी एक रचना....          अधूरा ग्रन्थ,...           ----------         मन ...मन ही तो है...         सोचा करता है...         किया करता है...       एक ग्रन्थ तैयार करने की  सोची...         नाम रखा था...''मानव""         कुछ परिभाषाएं पढ़ी          सहायतार्थ....         कुछ इस प्रकार निकली           मानव की व्याख्या ....          है सच्चा मानव वही..          जो दयावान हो..          परमार्थी ..चरित्रवान हो...          स्वावलंबी-गुणों की खान हो...          परमार्थ में जिए...          परमार्थ करते  मरे            किन्तु अफ़सोस... ...

क्या ऐसी कोई रीत प्रीत

क्या ऐसी कोई प्रीत रीत तुमने भी कभी...  ------------------------------------------------  सज धज वो डोली आई थी लाखों अरमान संग लायी थी एक छोर लहू को रख सहसा एक डोर बंधी चली आई थी कहो क्या ऐसी कोई प्रीत रीत तुमने भी कभी निभाई थी एक माटी से दूजी आकर  खुद मुरझाई जड़ें जमाई थी एक उपवन महकी खिली बहुत एक मधुबन लगी बनाये थी बाबुल प्यारी माँ की लाडो जो तनिक हवा कुम्हलाए थी  झुनक पुलक नव घर आँगन सतहों से गर्द हटाए थी एक खटके पर जगते सोते प्रतिपल अंतस दहशत जीते  बसी नए देश रची नए भेस  जित ममता समता परछाई थी कच्चे धागों की आड़ लपेटे अनगिन अखण्ड ताने बाने खींचे सब अपनी ओर उसे उसको ही थे सब सुलझाने दो हाथों जिसने एक समय सौ मांगों वफ़ा निभाई थी जन्म जन्म के रिश्तों पर विश्वास हृदय जीती हो जो समदृष्टि करो देखो उसको हर दर्द सहज पीती है वो दूजे के चेहरे खिले देख  जो रोम रोम मुस्काई थी शमन दमन चाहत करते सहज विषम विष भी पीकर रही रात जगी सारी फिर भी ममता उठ पड़ी कमर कसकर थे हाथ घाव फिर भी जिसने वत्सल मन रोटी पकाई थी घर बड़ा मिला या फिर छोटा माना उसको ही सुख का गाँव रही चादर छोट...

उसने कहा पीड़ा

मैंने कहा  प्रेम -उसने कहा.... ***************** मैंने कहा - प्रेम उसने कहा पीड़ा मैंने फिर से कहा -प्रेम इस बार वो पूंछ ही बैठा- कैसे? घण्टों बैठी रही मौन हाथ थामे उसका .... फिर पूँछा- अब कहो- प्रेम या पीड़ा... नम आँखों से बोला  शायद तुम सही... या फिर कुछ कुछ मैं भी.... किंचित आश्वस्त  मुस्कान सहेजी मैंने  आँचल की कोर पर.... फिर अचानक ही न जाने कहाँ गुम गया वो... दुनिया की भीड़, भरी दोपहर.. खोजी जो ठहरा करता होगा कही अब भी  प्रेम में पीड़ा की खोज  किन्तु विश्वास है मुझे किसी एक दिन जब भी ये नम हथेली उसका हाथ थाम बैठ जायेगी उसकी हर पीड़ा निरर्थक हो जायेगी जीवन शोध को उन्मुख  उसकी सोच की,,, एक प्रति और बढ़ जायेगी ..... प्रियंवदा अवस्थी 2012©

भीगी पाती

नितांत गहरे और सर्द सन्नाटे में तुम्हारी यादों का लिहाफ ओढ़े  दिसंबर को एक बार फिर जनवरी में तब्दील होते  नीरवता से निहार रही हूँ..... तुम्हें पाकर, खोने के बाद नींद और सपनों की आपस में ऐसी अनबन हुई है कि दोनों एक दूसरे की तरफ़ बेमुरव्वती से पीठ घुमाकर बैठ गए हैं ठिठुरती देह के भीतर  सिमटती गर्माहट में सावन अब भी उतना ही ज़िंदा है जैसा उस आख़री पल मैनें तुम में छोड़ा था....  नस नाड़ियों शिरा धमनियों में अलबेली प्रीत का मयूर मदमस्त हो नर्तन करता है उमड़ घुमड़ मन के सघन मेघों के  झरझर बहकर थम जाने के बाद भी मन के मौसम में जाने क्यों कोई विशेष परिवर्तन नही होता.... उम्मीदों की किरण  पलकों पर अटकी शबनम से टकराकर परावर्तित हो जाती है,, मन के आकाश पर अब इंद्रधनुषी झूले नही पड़ते,,,,, दिन की तपिश  अपना  कितना भी चरम चूमे यादों से पसीझी गलियारी में उमस नही पनपती..... सीले सीले अंधकार में हथेलियां आपस मे उलझाए  भीनी सी एक खुशबू  टहल करती मिलती है,,, खुशबू ,,,  शायद हमारे आखिरी मिलन की...... ढलते वक़्त की मुंडेर पर चढ़ खिल उठे चांद को देख चहककर ठिठक गई ...