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कुछ ऐसा ही मौसम था न वह

याद तो होगा अब भी तुम्हें,, कुछ ऐसा ही मौसम था न वह जब दुःख से पहाड़ हुए किसी ठिठुरते दिन  को ज़मीन कुरेदती धूप की पैनी  नज़र से मिलते ही नज़र  मिल गए थे तुम बेहद बेकल बेघर,,,,,,,,, सुख दुःख से पुरनम हथेलियाँ आपस मे उलझाते ही  आँधियों की बात चल निकली थी,,, हालात भी कम तूफ़ां न हुए थे,,, फोड़ देने को आसमान सर पर कितना घड़घड़ाए थे बादल रह रह कर ,,, बिजलियाँ भी कम न गिरीं थी चाहतोआसपास,,,,, बेहिसाब बत्तीसियां किटकिटाते,,, तुमने और मैनें बरसों देखी फिर अफवाहों के जंगलों की वो दुर्दांत दावानल,,,, जो बुझते बुझते ही बुझ सकी थी शायद,,, हाँ शायद ही कह सकती हूँ अब भी ,,,, क्योंकि,,,, ये हुस्न और इश्क की बातें बनते ज्यों बेहिसाब अश्कों के तक़ाज़े..... धुआं अब तलक उठ रहा है उस मोड़ पर,,,, हुई बेमौसम बारिशें जिधर जी भर,,,,, सुनो,,,, देख लेना कभी पलटकर,,,,,, शायद कोई अब तक सुलगता हो भीतर ही भीतर..... प्रियंवदा