प्रीति कलश जल
प्रीत कलश जल छल छल करके छलक पड़ा
हाय ऐसे कैसे श्याम , हाथ तुमने पकड़ा
सीझ गया अंग अंग भीगे सब वसन मेरे
खेल सयाने खेल हँसे खड़े हर डग घेरे
चुन चुन डगर अकेली करो हो मनमानी
अँखियन अश्रु देख बोलते प्रीतभरी वानी
बोले जो जग छलिया कोई मिथ्या बात नही
मोह बिछोह सब खड्ग तेरे तके नित घात नई
प्रियंवदा अवस्थी
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