कोई तो लाये खबर तुम्हारी

तुम बिन कैसी है दिखती 
देखो प्रिय तुम्हरी प्यारी
भटक रही प्यासी हिरनी सी
मरुथल मरुथल हारी
घायल मन बिकट बिचारी
कोई तो लाये खबर तुम्हारी

जीवन था कितना प्यारा
जब संग संग हम चलते थे
एक आहट पीड़ा की सुनके
घन वन मंथन तुम करते थे
विरह दाह मैं जाऊँ झुलसी 
श्रवण ना पहुंचे आह हमारी
कोई तो लाये खबर तुम्हारी

विकल धरनि असहाय डरी 
फ़टे दृग हूँ अनन्त को वारे
मृतसम जिह्वा सिले अधर
मन चातक चीख पुकारे
स्वाति झरे दो बूंद प्रीति की
हो जाये इति बिपदा री
कोई तो लाये खबर तुम्हारी 

रच दो प्रिय इस मस्तक पर
अब तो तुम नाम तुम्हारा
झलक निरखते भव्य तेरी
हो जावे भव उजियारा
जाने किस क्षण तज देंवे अब
ये स्वांसें संग हमारा
घुट घुट साध रखी जो कबसे
करूँ तुम पे सब बलिहारी...
कोई तो लाये खबर तुम्हारी

प्रियंवदा अवस्थी

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