क्या इसी मंज़र को उम्रदराज़ी कहते हैं
सुनो मुझ मे बसने वाले मेरे तुम.. तुम मुझमे पूर्णाकार लेने को अति विह्वल दिखते हो आजकल,,,, सफलता निष्फलता के ताप पर सिकीं ताजी मीठी रोटियों के निवालों पर मुँह के भीतर बैठी असंख्य स्वादेन्द्रियाँ अब वैसा द्रव्य नही लपेटती ,,, दिन महीने और सालों के , नवरस अनुभवों का आस्वादन कर सब कुछ अब समरस लगने लगा है,,,,, होने और न होने के मध्य उपज पड़ने वाली बेचैनियों की जड़ें अब जैसे सम और विषम के बीच शांतिवार्ता कर उसी बरगद के नीचे की भूमि पर बैठकर सुस्ताने को आतुर दिखती हैं जहाँ बैठकर कभी तुमसे क्यों क्या और कैसे के तर्क वितर्क किए थे प्रशंसा से भीतर सुख का रसायन उपजता तो है किंतु वह अब उच्श्रृंखल नही होता आलोचनाओं की आँखों की तीक्षणताएँ अब मन को उतना विषाक्त नही करती ,,,, ग्राह्य अग्राह्य की सीमाओं के मध्य की रेखा पर ठहर कर उन्होंने हृदय और मस्तिष्क के मध्य चौखट पर नीलकंठ बैठा दिया है .. अपेक्षित अनपेक्षित आहटों से हृदयगति उखड़ कर अब स्वतः ही थमने लगती है ,,,,, उन्हें थमने को किसी के सहारे की आवश्यकता नही पड़ती,,,,, सावन की रिमझिम फुहारें रोम छिद...