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Showing posts from March, 2019

क्या इसी मंज़र को उम्रदराज़ी कहते हैं

सुनो मुझ मे बसने वाले मेरे तुम.. तुम मुझमे पूर्णाकार लेने को अति विह्वल दिखते हो आजकल,,,, सफलता निष्फलता के ताप पर सिकीं ताजी मीठी रोटियों के निवालों पर मुँह के भीतर बैठी असंख्य स्वादेन्द्रियाँ अब वैसा द्रव्य नही लपेटती ,,, दिन महीने और सालों के , नवरस अनुभवों का आस्वादन कर सब कुछ अब समरस लगने लगा है,,,,, होने और न होने के मध्य उपज पड़ने वाली बेचैनियों की जड़ें अब जैसे सम और विषम के बीच शांतिवार्ता कर उसी बरगद के नीचे की भूमि पर बैठकर सुस्ताने को आतुर दिखती हैं जहाँ बैठकर कभी तुमसे क्यों क्या और कैसे के तर्क वितर्क किए थे प्रशंसा से भीतर सुख का रसायन उपजता तो है किंतु  वह अब उच्श्रृंखल नही होता आलोचनाओं की आँखों की तीक्षणताएँ अब मन को उतना विषाक्त नही करती ,,,, ग्राह्य अग्राह्य की सीमाओं के मध्य की रेखा पर ठहर कर उन्होंने हृदय और मस्तिष्क के मध्य चौखट पर नीलकंठ बैठा दिया है ..   अपेक्षित अनपेक्षित आहटों से हृदयगति उखड़ कर अब स्वतः ही थमने लगती है ,,,,, उन्हें थमने को किसी के सहारे की आवश्यकता नही पड़ती,,,,, सावन की रिमझिम फुहारें रोम छिद...

वह आश्वस्त नज़र आई

एक दिन ज़िंदगी ज़िंदगी देकर मुस्कराई.... बात समझ मे आई....न आई वह रोई फिर सम्हली और थोड़ा थोड़ा मुस्कराई वक्त के साथ करवट बदली , कुछ दिन घुटनो पर चली बैठी भी कुछ पल, फिर ज़िन्दगी के साथ उसने कदम ताल मिलाई...... किसी एक सुहाने से दिन वह  दो पंख ले आई..... सहमी, ठिठकी, फिर सुदूर गगन पर ज़िंदगी ने ऊँची छलांग लगाई..... बदलती ऋतु की मुंडेर पर किसी सन्नाती सी दोपहर वो एकांत में मिलने आई बलखाते शर्माते कानो में जाने क्या फुसफुसाई सुनकर वह कुछ झिझकी गालों पर गहराई ललाई...... शायद बात मन को थी लुभाई गुनगुनाते भरमाते उसने यूँ ही एक उम्र बिताई....... इस बार जबसे वो गई पलटकर बरसों पास न आई..... कभी कभी बस सपनों में दी दिखाई.... पल छिन उसे यहाँ वहाँ ढूंढते हाथ आई तो महज तन्हाई .... एक ढलती हुई साँझ आँगन उतरी उसकी सी परछाई मिलने की चाहत बेतहाशा दौड़ी ,,, छटपटाई शायद ज़िंदगी ने ज़िन्दगी से कुछ आस थी लगाई..... चौतरफा सिर्फ परछाई और परछाईं भर्राई गिड़गिड़ाई बेचारगी भी जताई ज़िंदगी ..... ज़िन्दगी पर नज़र फिराई कर्णभेदन करती अट्टहास लगाई घुटनो पर रेंगती याचना नख शिख तक तिल...

नेक समय आएगा इक दिन

नेक समय आएगा इक दिन सोचे मन की अभिलाषा बोलेंगे प्रियतम मुझसे जब मन से मन मिलती भाषा... ऋतु घूमे ज्यों एक चक्र पे काश प्रेम भी नियम बनाता चतुर्मास वो मिलन सजाता आठ मास बिरहा गा...