ए अश्क तू हो जा रिहा
ऐ अश्क हो जा तू रिहा
हर दर्द को आज़ाद कर
तन खोखला ये हो गया
अब रूह मत बर्बाद कर,,
तुझे पालते रहे खुशियों गम
सदियो किये तुझे जज़्ब हम
हर सब्र ओ करार का वास्ता
आँखों से झर जा दफ़्अतन,,,,
सफर ए राह मिलती जाएगी
औ पनाह भी मिल जाएगी
मंजिल भरेगी तुझमे रंग नए
सुख ए चाशनी में रंजो गम,,,,
दरिया बंदिशे कब तक सहे
रफ़्तार ए जिंद तू भी जिए,
सो जाना हो सागर में रवां
ओढकर अम्बर का कफ़न,,,,,
प्रियंवदा अवस्थी
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