मेरे ख्वाब हो तुम
कितनी दफा टूटे हो तुम....
फ़क्त दो ख्वाहिशें पूरी करते
एक यूँ ही बने रहो ..एक यूँ ही ठहरे रहो .....
धुन्धलाये कभी ..पास आये कभी ..
सिमटे कभी पलकों पर
कुछ बिखरे भी इन अलकों पर ..
कितने कुम्हलाये तुम ,करवटों से उलझ के
सिर्फ ठहरे बने रहने की ,बंदिशों में बिंधते
तुम सच ही हो कहते ,हकीकतन कितने दर्द
तुम भी तो हो सहते....
आँखों-आँखों पर खुशियाँ धरते ..
माना मेरी रातों के अरमान हो तुम
चटकीली सुबहों के आगाज़ हो तुम
पर मेरी हर बंदिश से अब आज़ाद हो तुम ....
नाज़ुक बहुत हो...मेरे ख्वाब हो तुम.....
प्रियंवदा ....
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