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Showing posts from November, 2019

स्त्रियाँ बेहद सरल और सुगम्य होती है

सुनो मुझमें बसने वाले मेरे तुम तुम्हें अब तक  न जाने कितनी ही पातियाँ लिखी  जिन्हें एक एक कर करीने से सहेज रखा है मैंने दिनोदिन पुरानी और जर्जर  होती सी सन्दूकची में किसी एक दिन जब तुम फुर्सत होगे और हम भी उऋण हो चुके होंगे रिश्तों के हर लेन देन से निकल चलूंगी तुम्हारे साथ नदी के समागम की मिठास से सम्मोहित  ठहरे हुए अमावस के उस सागर की तरफ जहाँ तुमसे मेरी पहचान हुई थी बिठाकर तुम्हें वहीँ साहिल पर निसार दूँगी सब के सब तुमपर मेरे आँचल में भरकर.... मेरे हाथों में लिपटी स्याही देखकर अक्सर ही तुम्हारे कौतुक को खुद से उलझते देखा है मैंने सुनो तुम्हें ये कहते सुना हैअक्सर  स्त्रियों को समझ सकना बड़ा कठिन है वे कब क्या और कैसे के व्यूह में उलझाए ही रखती हैं  हमेशा पढ़ना तुम लहर लहर  साहिल से अनवरत टकराती  अनकहे ,,,,,,, गिरते थमते ,,,शोर करती स्त्री मन की जीवेषणा के  उन अनगिनत मौन आग्रहों को  जो चाहते हुए भी उसने  कभी जग जाहिर नही किये .... वस्तुतः उन पत्रों में तुम्हारे मन मे रह रह कर उठते कुतूहल सा ऐसा कुछ विशेष भी नही दिन प्रतिदिन के मकड़जाल...

मदमस्त और मदान्ध का भेद

एक दिन तुम्ही ने कहा था  यूँ ही बातों बातों में जब भी कभी जी करे, चली आना चुपचाप बिना कोई हंगामा किये, ताप सन्ताप व्यतिपात के इस जग को बिना  चिलचिलाते उलाहने दिए,,, उपेक्षाओं से क्यों ही करना मन का उत्पीडन जीवन के आधारभूत तथ्य ही जब मंडन और खंडन , सब कुछ ठंडा पड़ जाता है नियति के नियत समय पर , वस्तुएं ,,,,, प्रायः भस्म हो जाती हैं विचारों के वर्तुलाकार  वलय मात्र, शेष रह जाते हैं ब्रह्मांड में,,,, जीवित और जीवंत में  यही तो है एक विशेष अंतर ,,, तेरा और मेरा यह तो हर जीवित की जीवेषणा का है झगड़ा ,,, मदमस्त और मदान्ध में भेद काल की अंतिम कगार पर  पहुँच कर समझ आता है  गरिमा सदा ही ,, मौन पथगामिनी होती है  और अहंकार पग पग   शोर करते हुए चलता है सुनो ..... धरा और गगन के छोर पर ठहर तुम्हारा पल भर को मुस्कराना कहीं कुतूहल भरे दिनमान का कारण तो कहीं शीतल निशा को  स्वप्निल आमंत्रण बन जाता है,,, सुना कुछ तुमने ,,,? ओ सुनहरी,,, मेरी सुंदरी ,,,, चली आना चुपचाप, बिना किसी शोर और उलाहने के मन को बिना कोई पीड़ा दिए धरती के दोनो ध्रुवो के मध्य  खिंची ...