मौन बोलते रहे
नीम की मुंडेर पर ,पीपली की छांव में सांवले सजन तेरे उस हरियाले गाँव मे पात पात लिख गई धूल अम्बु खेलकर प्रीत उग गई जहां साँस की सी मेड़ पर फिर मौन बोलते रहे मौन डोलते रहे ... जेठ ताप घोर था मन अजब सा शोर था ओढ़नी की कोर बंधी बेरियों का दौर था खन खनक उठी थी कलाई हरी चूड़ियां छुपके लाई जब पवन घुंघरू जड़ी तोड़ियां मौन खौलते रहे....मौन तौलते रहे..... कोई रश्मि मेघ को वेधकर छिटक गयी सप्तरंग घाघरी कटि स्वतः थी सज गई काल की मुंडेर पर रह रह के हुई गर्जना भीग उठे तप्त तन जब तोड़ सारी वर्जना मौन बोलते रहे मौन डोलते रहे.... प्रियंवदा अवस्थी