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मौन बोलते रहे

नीम की मुंडेर पर ,पीपली की छांव में सांवले सजन तेरे उस हरियाले गाँव मे पात पात लिख गई धूल अम्बु खेलकर प्रीत उग गई जहां साँस की सी मेड़ पर फिर मौन बोलते रहे मौन डोलते रहे ...  जेठ ताप घोर था मन अजब सा शोर था ओढ़नी की कोर बंधी बेरियों का दौर था खन खनक उठी थी कलाई हरी चूड़ियां छुपके लाई जब पवन घुंघरू जड़ी तोड़ियां मौन खौलते रहे....मौन तौलते रहे..... कोई रश्मि मेघ को वेधकर छिटक गयी सप्तरंग घाघरी कटि स्वतः थी सज गई काल की मुंडेर पर  रह रह के हुई गर्जना भीग उठे तप्त तन जब तोड़ सारी वर्जना मौन बोलते रहे मौन डोलते रहे.... प्रियंवदा अवस्थी

ये नैना चार होने दो

नयन से आज ओ प्रियतम नयन ये चार होने दो। कि ये तन आज फिर से प्रेम की बीमार होने दो।। लिखूँ मैं भीगी पाती फिर नमी पलकों कोरों से। कहीं अति दूर फिर से इक हृदय यलगार होने दो ।। हवा ख़ुशबू बटोरे स्वांस संग हलचल करे भीतर अधर बेचैन शब्दों के प्रबल उदगार रहने दो ।। मचलती प्रीति ठुनके डोर पर नील नभ चढ़कर विचलते दो पतंगों की तलब तक़रार होने दो ।। सुखों की धूप पर थोड़ी दुःखों की ओस झरने दो । विरह की ज्वाल से जलते हुए तन को ठिठुरने दो ।। तड़प जीने दो हृद आकुल को घनतम कोहासों की लिहाफों को मिलन स्वप्नों के कुछ श्रृंगार करने दो ।। बदलती ऋतु की डग चलके प्रीति परवान चढ़ती है। समय प्रतिकूल अपनों से अपनी पहचान बढ़ती है।। चलो हम भी धरा नभ से प्रकृति की रीति हर जी लें। पर्व बुनती पवन को अब जिधर बहना है बहने दो ।। प्रियंवदा अवस्थी