पुरानी डायरी के कुछ पन्ने
पुरानी डायरी के कुछ पन्ने
अतीत से फिसल बिखर गये
समय के बंधन तोड़.....
वर्तमान के उजाले सहेजते
आज दोपहर ....
अभी चार दिन भी न हुए थे
ज़िन्दगी की सिलवटें समेटे
कि पसार दी तुमने फिर वो
यादों की चादर ....
इस कच्ची ज़मीन पर ....
बड़ा अच्छा लगता है
उँगलियों पर इनकी झालरें लपेट
इनसे बार बार उलझना ..
अंधेरों की आड़ ले
औंधे मुँह लेट दाँतों से
इनकी रेशमी कोरें काटना..
बार बार इन्हें सहेजना ..
बार बार इन्हें बिसराने का
तुमसे झूठा दिखावा करना.....
प्रियंवदा
Comments
Post a Comment