मुझे पलटकर देख लेना बहुत अच्छा लगता है बहुत कुछ उठाते रहे हैं वर्षों से कभी कुछ फेंक देना अच्छा लगता है ।। बिखर गए जो अरमां दुपहरी की तपिश सह के अंधेरों की आड़ रख उनको नमी की स...
माँ तुम सब कुछ कैसे जान लेती हो परछाइयों तक के ग़म पहचान लेती हो हथेलियां सुखाती हैं जब भी तपकर किस्मत की कुछ नम लकड़ियाँ हवाओं में घुलकर पलकों बिंधी हर एक नमी एक फूँक में छान ...
रखी मेरी कुछ किताबों में एक वो भी किताब है जिसपे लिखा मेरा नाम, तुम्हारे नाम के बाद है ।। माँ ! मुझे वो सब याद है क्या तुम्हें अब भी याद है ? ये बातें सुन आँखों में फिर एक कहानी घूम ...
उस पार का सूरज ########### बहुत खेले खेल हमने तुमने लुका छिपी के, दिन उगे यहां चलो अब निकलें हम बाहर इस काठ के ताबूत से ,,,, समय खींचने लगा रेखाएं उम्र के माथे पर अपने ताप से,, कुछ तो अब तय कर ल...
निबाहो प्रीत एक सी तुम जरूरी ये नही प्रियतम मेरे आकाश पर तुम चन्द्र की तरह मिला करना । निपट लूँगी अंधेरों से झलक मिलती रहे नित प्रति चले आना किसी पूनम अमावस की व्यथा कहना ।...
पियु लाये चुनरिया लाल पहन मैं उन्हें रिझाऊं नख शिख कर श्रृंगार आज खुद पर इतराऊँ आंगन बैठ तके हैं राह मुखर नैन संग कौतुक भाव चमक उठे हर एक आहट पे कब मैं झलक दिखाऊँ कंगना हार क...
मैक़दे जब भी जाता हूँ तभी मुलाक़ात होती है । एक मेरी अब वहीँ उससे दिल की बात होती है ।। ढूंढते फिरता था जिसको मैं होकर खानाबदोश। वो जिसके वास्ते दिन ही न ही कोई रात होती है ।...
ओढ़नी जो थी... ढांकना ही जिसका काम कभी बुरी नज़रों से कभी सूनी डगरों पे कभी चिटकती धूप को तो कहीं चमकते रूप को कभी किसी एक रंग को तो कभी किसी बदरंग को समय अथवा बेसमय ढांकती ही रही ...
उनकी प्रीत ही कुछ ऐसी बादल औ बरखा जैसी मास दिवस जप तप कर थे वो कभी मिल पाते ऋतू देवो के पाँव दबाते फिर भी न जाने क्यों जब भी पास आते बेबात आपस में टकराते.... चले आते घड़ घड़ातेे न जान...
पखवारों दर पखवारों , क्या कुछ न सहेजती है जब ये स्याह रात... तब लेकर आते हो प्रिय तुम चाँद अपने हाथ और कहते यह छोटी बात.... क्या जानो तुम पीड़ाएं तृण तृण तम पीने की जीवन साधन सुलभ असह...
जीवन की वेदी पर लिखते ही प्रीत की स्वास्तिक, न जाने क्या हुआ इस ह्रदय को बस यूँ ही.... कि देह से विदेह होकर स्वयं का सब कुछ प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सजा कर बैठ गया एक स्तंभित मन आह् ...
प्रीत का अजब ही फलसफा कि कई बार जब ये एक अकेला मन मन का ही नही रहता .... रहकर भी एक तन भीतर इसकी सीमायें तोड़कर कितने ही विग्रह हो जाते इसके भागते फिरते फिर इधर उधर प्रिय की मीठी बा...
एक मैं पूंछे है रह रह कर मुझे बार बार तुम तुम कहकर गूँज रहे इन कानों में कल तक रहे अपने वो ही स्वर क्या है शाश्वत और क्या नश्वर कुछ भीतर भीतर टूट गया उठ कंठ लगा फिर फूट गया झिलम...
पंखुरियां सहेज रखी हैं गुज़रे कुछ लम्हों की इन हथेलियों के नीचे.... तुमको समेट बैठी हैं कुछ यादें ,आज फिर एक सूने झुरमुट के पीछे... एक सावन था रीझा जिसपर आज उसी एक डाली पर... एक जीवन ड...
शब्दों में ढाला है तुमको हर कविता में तुम ही तुम चाँद बने काली रातों को उगे प्रात आँगन भी तुम ढले कभी नैनो मोती बन किये कभी अधरों पे फेरे तुम ही बरसे सूखी धरती स्वप्न हरित तु...
ज़िन्दगी अब तक तुमने जितने भी रेखाचित्र बनाये भुरभुरी सूखी रेत पर मिटने नही दिए मैंने जिस दिन चाहो पलटकर देख लेना मेरी बन्द मुट्ठी को कितनी भी फिसलन भरी तासीर रही तुम्हार...
एक टुकड़ा चाँद का मिल जाये गर मुझको कहीं मेरे मस्तक पर सजा मैं तो चांदनी बन जाउंगी पिरोकर झिलमिल सितारे ओढ़नी के कोर पर ओढ़ चूनर स्याह सी मैं प्रिय मुखर हो जाउंगी भीगी भीगी एक ...
सांसें फिसल रही हैं एक उम्र ढल रही है दिल की जुबान अब कुछ आँखों से कह रही है यूँ ही बात बात में कब बचपन गुजर गया एक जिस्म जवानी की दहलीज चढ़ गया खोले जो उसने पट तो महफ़िल शबाब पर थ...
तुम हाथ छुपाये रंग पिया सब खबर मुझे है तेरे चंचल नैन सधे हैं क्यों सब खबर मुझे है हाथ बटाने को क्यों आतुर भोर भये काज सब मेरे रंग ढंग ये बदला बदला खोल रहा सब राज तेरे ऊपर से हो ...
गुजरती रही मैं हर लम्हा एक वो नही गुजरा करता बसा भीतर कहीं मुझमे तुम्हारा हूँ ..कहा करता... शहर अपने में ही रहते परायों से मिला करते चमन इस में खिले गुल पर भेंट काटों किया करते ...
अदाएं याद आती हैं वफायें याद आती हैं मेरे गुजरे हुए लम्हे तुझे लिखनी ये पाती है तुम्हारे देस की यादें तुम्हारे भेस की बातें फुहारों भीगते से दिन महकती चांदनी रातें बहुत ह...
बिसरे हुए कुछ प्रेम गीतों की धुन उनसे हुई दूरियों नापते हुए मन करते कितने ही श्रृंगार निकल गया फिर से उस पार लगा झूलने सहसा ही वो पकड़कर इंद्रधनुष की डोर पींग बढ़ाते उठा गगन ...
तुम्हारी सीली यादे हूकती हैं कसकती हैं होकर भी जो तर ब तर कभी बेहद तरसती हैं तो कभी जी भर बरसती है इस भुरभुरी मिटटी की एक कच्ची सी बस्ती में कुछ खटकती सी दीवारें फिर आँखों स...
बहुत तरसी मेरी अँखियाँ चिटकती हैं कोरी रतियाँ की अब चले आओ ना प्रीत बरसाओ ना गर्द आँगन दर्द है मन तपी है छत दीवारें सन्न न अब तरसाओ ना प्रीत बरसाओ ना बुझे चूल्हे ठनक कुठले उ...
होश किसको खबर किसे कि अभी जिन्दा हूँ तमाम उम्र से जिस दर की मैं बाशिंदा हूँ.... जितना मशरूफ ज़माने की भीड़ में है वो उतना बेख़ब्र भी लगता मेरे ठिकाने से, टूट जाए ये तिलस्म इसी आस मे...
वो एक रात थी जब गगन और था कुछ पवन की सुनी उसने बातें जो चंचल खिली बारिशों से,जब नहाई थी राहें और मुस्कान होठों, शरारत सनी थी ..... बुने ताने बाने सुरख शाम ने थे जो कुछ गुनगुनाते हुए ...