पीहर की दहलीज बहुत याद आये
आज वे दोनों ही लेकर बैठ गए
अपनी अपनी सजी सजाई पिटारी ,,,
पीहर की यादों भीगी दहलीज पर
पहले खोलने की होड़ ले,कर पूरी तयारी....
एक दुसरे से जताते हुएअनबन
एक ठहरा तन.....और एक चंचल मन....
चमक उठी फिर नजरें
मुस्करा उठे शुष्क अधर
विस्मृत हो चली सी रीत को
पुनर्जीवित होता देखकर
मन की पोटली बांध लाया होगा
शायद मनिहारी
कुछ लाल हरी सी चूड़ियाँ
रंग बिरंगे कपडे पहना
सजा लाया होगा वो
गुड्डा गुड्डी की जोड़ियाँ
कि अचानक ही बगल की
दूसरी पोटली भी कसमसाई
आस पास एक मादक सी खुशबू उथलाई
सावन की रिमझिम शायद
थोड़ी मेहँदी भी है भिगा लायी
कभी इस पार तो कभी उस पार
सजने लगे फिर सोलह श्रृंगार के ठेले
झुमने लगा तन मन बादलों के हिंडोले
बरसों बीत गये ,ऐसे सावन को आये
पीहर की दहलीज आज फिर से
बहुत याद आये.....
प्रियंवदा
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