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Showing posts from January, 2019

कितने उज्ज्वल दृश्य हुए

स्पंदित हुए तार तार मन वीणा के,पदचाप भर से.... कितने उज्जवल दृश्य हुए तुम श्याम ! मेरी नज़र से.... झुकी झुकी सी बदलियाँ मुख मंडल से हटाते अलौकिक मुस्कान , मंद मंद मुस्कराते... स्तम्भित से चक्षु गात औ मूक -अधर तद्यपि गूंज उठे मन भीतर मुखरित सप्त स्वर.... लगी सिमटने सुर्ख साँझ नव वधू, रूप धर श्यामल से,इक कोने में..... चुपके चुपके पलक ओट कर प्रियतम डग पावन हो बिखरे  इधर उधर , कुछ सुर्ख गुलमोहर....... प्रियंवदा अवस्थी"© 2014

क्षितिज की मुंडेर पर

क्षितिज की मुंडेर पर पसरी हुई चटक स्याह ओढ़नी को हटाते चाँदनी के आंगन के उस पार ठीक पीछे वाली सघन नीम की छाँव के तले सुकोमल उंगलियों से समय की भुरभुरी मृदा पर अबूझी आकृतियाँ बनाते मिटाते बार बार मंद मुस्कराते खेलते देखा है अक्सर ही मैंने तुम्हें..... ऐ ज़िन्दगी..... ऐ वक्त.... तेरी इस धूप छाँव की लुकाछिपी से जूझते तुझे समझते और बूझते माथे पर ढुलकी अलकों की रंगत बेरंगत है हो चली  मन को ठहराव के अनवरत पाठ पढ़ाते एक तू ही है जो न बदली और एक वो  जो भुरभुरी माटी कुरेदते उससे रह रह खेलते न थका .... प्रियंवदा अवस्थी

प्रीत के पाखी को चिंता

प्रीति के पाखी को चिंता कब कोई बंधन मिले । लगन लगते लौह पिंजर तोड़ नभ वह उड़ चले ।। स्वप्न के पाँवों से बिछड़ें लाख घुँघरू नींद के बंद हो या जागती पलकों पे मदन नर्तन मिले ।। हो कटी जिह्वा भले और कंठ वाणी लोप हो। मौन के तट बैठ मन सौ बात करते ही मिले  ।। लोक के हों बन्ध या प्रतिबंध रोके मिलन को नयन मिलते नयन सों प्रिय प्राण इक होते मिले।। प्रीति के प्रियंवदा अवस्थी

सुन रे मन

सुन रे मन..... तेरे क्षण क्षण होते विचलन से कदमों तले की धरा रह रह क्यों कम्पित होती है? यद्यपि तेरी कोई नाप न ही तौल न ही तेरा कोई भार न ही तेरा कोई रूप स्वरूप फिर भी जाने कितने ही आ...