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सताये को ये दुनिया क्यो सता जाती

 अटक राहों टिकी नज़रें भटकता मन विकल मेरा ज़माने की लगी बंदिश बड़ा ज़ालिम है यह पहरा मिलन मन जागते ही झट कुचल देती तेज़ धड़कन  नमी आंखों की पीते हैं  छुपाते सबसे रंज और ग़म वो एक जो छाँव अपनी थी छीन ली उस ख़ुदारा ने दहल तन्हाइयों फिर फिर बहुत उसको पुकारा है  वो जिनके साथ दुःख बांटे भूखों साझा किए थे थाल बिछाकर आज सब बैठे वही शतरंज की सी चाल  यही एक दोष था अपना कि तुझ संग प्रीत हो जाना वो जो कल तक लगे अपने सुनाते पेट भर ताना  ज़माने भीड़ है काफ़ी मग़र तन्हाइयों में टूटते हैं हम तुम भी उस पार तरसे हो बरसे कितना यहां भी हम अक्सर क्यो यहाँ होता कि मोहब्बत जंग बन जाती सताए दिल को क्यो दुनिया और बढ़कर सता जाती ।। प्रियंवदा अवस्थी