मिल जायेंगे किनारे

कुछ कतरे हैं आंसू के 

सैलाब है आँखों में ...

पूंछो न सबब क्या है 

उठती थमती साँसों में ...

तेरी याद है आँखों में 

बातों से महकती हूँ ..

तन्हाइयों में अक्सर 

लहरों सी बहकती हूँ ..

मेरा जोर नहीं खुद पर 

इक़रार से डरती हूँ 

ज़ालिम बहुत है दुनिया 

इज़हार से डरती हूँ 

तुम खुद ही समझ लो ना 

झुकी पलकों के इशारे 

पलकों को मूँद लूँ तो 

मिल जाएँगे किनारे ...

प्रियंवदा         

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