जब रीत ही अपनी समर्पण
क्यूँ मांगूं मैं तुमसे कोई वचन
जब रीत ही अपनी समर्पण ...
क्यूँ उठें निर्मूल आशंकाएं
अटल जब प्रीत है और हैं हम
निरर्थक बंदिशें क्यों हों
फिर फिर साथ निभाने की
क्या जरूरत नित नित हमे
ऐसी खोखल शपथ उठाने की ...
जीवन मृत्यु चक्र से परे
तुम्हारा मेरा प्रेम ..
अडिग अपने अपने पथ पर
दिन प्रतिदिन निरंतर ..
चाह कर भी कोई जिसकी
कभी थाह न ले सके
चिर स्थायी ब्रह्माण्ड भी क्या
धरती का आकाश छीन सके
फिर क्यों मांगूं मैं तुमसे कोई वचन
जब रीत ही अपनी समर्पण ....
प्रियंवदा
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