कैसा ये रिश्ता अब तक न जाना
कि बार बार लगातार
सिर्फ एक ही प्रश्न मेरा
मुझसे ही....
कि कौन वो मेरा ..
क्या है ये नाता गहरा
कि दिखे वो मेरा हो मुझमे ही
मेरी हर सीरत से गुज़र
मेरी हर सूरत में,
ये उसका बार बार छूकर
गुज़र जाना
फिर गुज़र कर छू जाना,
अजब है कशिश,
अभास का अहसास बन जाना
खुले बन्ध में बँध बँध जाना
तो कभी बंधे बिंधे
बिखर बिखर जाना
सुनो प्रिय !
कैसा ये रिश्ता
अब तक न जाना ....
प्रियंवदा अवस्थी
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