कल जब मैं सुपुर्द ए ख़ाक होऊं
कल जब मैं सुपुर्द ए ख़ाक होऊं
मत करना कैद मुझे फिर से
उस बंद ताबूतनुमा कलश में
मत बहाना तुम मुझे
किसी पवित्र जलधारा में
गुजारिश है तुमसे ..
मत भिगोना उन गर्म राख के
धधकते कतरों को अपने आंसुओं से
नहीं चाहिए मोक्ष मुझे
तुम्हारे प्रेम से ..
आज़ाद कर देना मुझे
इस बहती हवा की तरह...
जिसमे घुलकर ..मैं
रच-बस जाऊं हर उस पगडण्डी पर
जहाँ जहाँ तुम अपने पाँव रखो.....
प्रियंवदा
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