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Showing posts from August, 2018

यादों की फुहारें

#भीगासावन यादों की फुहारों का मिल जाना क्या सफ़र में आभास उस छुवन का सिहरन ठगी बदन में साँसों के थपेड़ों में उलझी वो ही महक थी सावन मिला नहाते मन बीच एक तरण में ।। हाथों की उँगलियों में पीतल का छुपा छल्ला करने लगा सगन घन धरती से हो निठल्ला पलकों की पाट मन को बैठा के साथ बैठा पींगें बढ़ा के संग संग रहा डोलता  गगन में।। संझा की सुर्खियाँ भर सिंदूर नभ सिंधोरे ..... बादल की ओट शशि ने निशि मांग फिर सजाई भीगी चुनर को सर रख झुकते हुए नयन पर रचने लगे प्रणय प्रिय, प्रिया भाव आचमन में।। प्रियंवदा अवस्थी

छत पर मेरे ठहर एक क्षण

छतजब सूरत सी सूरत नही है  तब तो हर वक्त आईना निहारती रहती है जो ऊपरवाला थोड़ी खूबसूरती दे देता तो न जाने क्या करती महारानी। दादी अम्मा की धारदार बातें सुनते ही तन मन मे बहती जवानी की रौ की अबूझ पहेली सुलझाती हुई चंदा का दिल जैसे छन्न सा होकर टूटकर रह गया ।आंखों में छलछलाहट और सामने के आईने में मानो सैकड़ों दरारें पड़ गयी हों और हर एक टुकड़े के उस पार से झांकता हुआ उसका शांत चेहरा सहसा ही ज्यों वीभत्स आकार लेकर उसे ही डराने दहलाने लगा। उसने झट से अपनी आंखें मींच लीं और हम आंखों धड़कते हुए दिल से वह दर्पण से दूर हट गई । सांवली सलोनी सी चंदा , हाँ वो चंदा किन्तु अपनी मृत माँ के दिये नाम से बिल्कुल विपरीत । चन्द्रमा जैसी तो बिल्कुल नही थी वह । शक्ल ओ सूरत में बिल्कुल सामान्य सी दीखती थी, माँ बचपन मे जन्म देते ही गुज़र गयी और बापू जवानी की दहलीज पे कदम रखते ही चल बसे अब ले देकर उसकी बूढ़ी गरीब दादी ही रह गयी थी उसे सम्हालने के लिए। क्रमश:  छत पर मेरे ठहर एक क्षण बादल बरस गया भिगो तप्त तन प्रीत फुहारों देकर मरज गया अता पता मालूम नही जो लिख भेजूं सन्देस गरज़ चमक इठलाता वह अब जाने किधर गया...

उनसे भेंट हुई सावन में

उन से भेंट हुई सावन में नयना चहक उठे आंजन में स्वांस स्वांस संगीत मिलन का घुंघरू झुनक उठे झांझर में कर सोलह सिंगार दृष्टि से होय हरित मन प्रीति वृष्टि से प्रीति डोर गुँथ ली वरमाला सजा मेघ मंडप आंगन में पुष्प लता कलियाँ हरषाई मटक ठुमक पुरवा अंगड़ाई उफ़नाये सब ताल तलैया मोर युगल मदमत नाचन में चढ़ छत पर मुस्काई बरखा स्वेत श्याम का भेद न परखा खेल फुहारों के मतवाले अबकी  पिया लगे सावन में प्रियंवदा अवस्थी

बादलों की चादरों पर

बादलों की चादरों पर फूल रेशम के खिले और तुम हर इक कली नव रंग भरते से मिले ।। क्रूरता वसुधा बसे उगें सैकड़ों कंटक जहाँ । शूल पगतल से हटाकर घाव तुम सिलते मिले।। चाँद की डग पर सितारे रोशनी रख हाथ मे स्याह घर की खिड़कियों से झाँकते तकते मिले।। धरा की धारें नुकीली जो चोट करती चोट पर औ गगन पर रिश्ते नाते संग साथ देते से मिले।। प्रीति की कटुतम परीक्षा स्वप्न में चलती बरस मिलन रचते चक्षु झिलमिल ओटकर झरते मिले ।। प्रियंवदा अवस्थी

एक पाती लिखनी है तुमको

एक पाती लिखनी तुमको क्या आज लिखूँ विरह कहूँ प्रिय या मिलने के हर राज लिखूँ ।। आन मिले जब निपट अँधेरी रात प्रिये सिहर उठा मन स्वेद स्वेद था गात प्रिये हाथ पकड़ते मुखर हुए चौमुख सन्नाटे नयन दर्प तक नयन सिमटती लाज लिखूँ ।। आलिंगित से दृष्टिपात मन गह्वर मंथन भ्रमित चित्त भूला पथ हृद गति के स्पंदन शब्द तालु अटके नस नाड़ी रतिमय नर्तन जम्भित रंध्र रंध्र अनुपम ऋतुराज लिखूँ ।। स्वांस स्वांस फगुवा फूटी अमराई की बौर पात पात मंडराया मधुकर जैसे कोई चोर मदन गंध छुप बैठी अन्तस् हिय पंकज ठौर आखर आखर प्रणय प्रीति पराग लिखूँ ।। प्रियंवदा अवस्थी

देह धर्म के हर उपक्रम से

देह धर्म के हर उपक्रम से धीरे धीरे ऊपर उठकर बुझ जाऊँगी जब मैं प्रियतम तुम तब सहज प्रकट हो जाना अथक यत्न भी दृष्ट नही जो चर्म चक्षु ये धृष्ट नही जो किसी भोर के उग जाने पर इन नयन...

वो बेवफा वक्त के माफिक

आज की हर बात को वो कल पे टालता रहा वो बेवफ़ा वक़्त माफिक वक्त निकालता रहा खुशी नाराज़ी मुहब्बत बात सारी दिल में रख  ज़िन्द की ख़ातिर फ़क़त ज़िन्द निकालता रहा चाहतों की बात मेरी  ज़रुरत उसके ठिकाने इक मुकम्मल होते ही वह दूजी रख जाता रहा ख्वाब नज़रों में जगे कुछ साँझ की सरगोशियों रात की करवट पे जालिम भोर लिख जाता रहा  वक्त की चौपड़ युगों से चौतरफ बिछती रही फर्क़ उसने कब किया कौन आता जाता रहा ।। प्रियंवदा अवस्थी

यूँ मत देख

यूँ मत देख कि झुलसती हूँ बहुत तनिक कभी ओटकर के देख। तपिश हर वक्त ही सही नही होती कभी ओस की तरह झरके देख ।। माना कि बहुत तंग हुई हैे गलियां, जिधर रहते रहे हम बरसों से । कभी चढ़कर खु...

एक सागर

सागर ...वर्तमान कभी नही पीता...... एक नदी कभी खारी नही होती पर्वतों से ढलकर, धरती पर उतरकर पथज मालिन्य ढोकर भी सागर के प्रेम में घुलकर भी,,, एक सागर कभी नदी नही लीलता वस्तुतः नदी की म...