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Showing posts from April, 2023

बहुत दूर चलना एकाकी

बहुत दूर  चलना एकाकी पथ चारों ओर अँधेरा । आ जाओ इक बार पुनः यह हाथ पकड़ लो मेरा ।। निज पग की आहट भी सुन मन भयभीत बड़ा है। परछाई सा तन ठिठका जड़ बनकर दीन खड़ा है ।। माना पथ दुर्गम था फिर भी बहुत सबल था साथ । निकल पड़े डग बदल अचानक तजकर मेरा हाथ।। क्या कमतरी रही जीवन क्यों मुरझा मन का फूल । संझा से सुर्खी छीनी निशि मांग भरी क्यों  धूल ।। पथ संगी सहसा सूझी क्यों मंजिल नई बनाने की। भूले वचन और वे सारी कसमें साथ निभाने की।। मूक अवाक खड़े तकते नभ शायद मुझे पुकारो । आलिंगन भरकर नयनों की आख्या नयन निवारो ।। प्रियंवदा

एक तुमसे जुदा होने के बाद

एक तुमसे जुदा होने के बाद  हर एक साँस सज़ा हो गयी यूँ ही साथ साथ चलते  न जाने क्या खता हो गई  कि दिल में हूक उठती है  ये आँखें रोज़ बहती हैं  फिसलती सी कुछ तारीखें तुम्हारी राह तकती हैं कहीं उस पार से तुम भी ये मंज़र तो देखते होंगे कहो कुछ न मग़र दिल की हर एक फरियाद सुनी होगी मैं इस जालिम ज़माने में तुझे अपना ना कह पाई यही ग़र एक खता मेरी सजा खुद मैंने अपनाई  मोहब्बत में ज़रूरी तो नही हर एक बात पूरी हो  और पूरी होने को एक  अदद हासिल ज़रूरी हो ।। प्रियंवदा अवस्थी