उजड़ी नींदों का सफर भी फ़िर सुहाना हो गया। गुज़रा यूँ छूकर वो पलके कि दीवाना हो गया।। करवटों पर लिख रहा था जब दर्द कुछ इबारतें । सिलवट ए मन खोलते वो तो परवाना हो गया ।। ख्वाब हो ह...
जो पीर दबी तेरे अंतस में वो पीर दिखाई दे मुझको। सौ जतन ढाँप लो किन्तु हर चीर दिखाई दे मुझको। अधरों पे रख मुस्कान सहज सैकड़ो बात बनाते हो । कर नखट चुहल नादान भाव कुछ इतर जताते हो...
रात्रि नींद जब आ बैठी इन पलकों को सहलाते । प्रिय बैठे आ निकट मेरे जग को ज्यों झुठलाते ।। मंद सुगन्धि पवन लाई रच जिसको दोनों महके मुखरित होकर अधर रुके जाने क्या कहते कहते ।। स...
ये कौन ? हुआ है आज किसी का कि कि अनछुए ही निष्प्राण हुई मुस्कराहट हो उठी मुखरित लगकर हृद की चौखट शुष्क रुष्ट तप्त आक्रांत स्वेदित नम हथेलियों पर ठहरी हैं कब चपल इच्छाओ की र...