अब तक न गई आदत तुम्हारी

अब तक न गयी वो आदत तुम्हारी
पलक झपकते खुशियाँ चुरा लाने की 
तभी तो उस एक दिन,
साँझ के जरा सा मुंह मोड़ते ही 
भर लाये थे तुम ,मुट्ठी भर सिंदूर
और सजा दी थी रात की मांग 
चुपके से ,उसके गेसू संवारते..... 
साक्षी है ,गगन का पहरेदार 
कितनी ही बार देखा मैंने उसे
और शायद तुमने भी तो....
तुम्हारी एक हर बात की गुपचुप
हूबहू नकल उतारते....
मोगरे चुने थे उसने चढ़ती हुई रात  
चांदनी की सुलझी अनसुलझी लटों पर
हौले हौले , बिना कुछ बोले....
तुमने जो पसारे थे 
अनछुए सिहरते हुए से कुछ स्वप्न , 
उस एक रात ...देखो न 
भोर से ही ये सूरज एक एक कर
तपती चुगलियां उगल रहा है
चाँद की....
हमे फिर फिर तरबतर करने को ....
प्रियंवदा

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