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सताये को ये दुनिया क्यो सता जाती

 अटक राहों टिकी नज़रें भटकता मन विकल मेरा ज़माने की लगी बंदिश बड़ा ज़ालिम है यह पहरा मिलन मन जागते ही झट कुचल देती तेज़ धड़कन  नमी आंखों की पीते हैं  छुपाते सबसे रंज और ग़म वो एक जो छाँव अपनी थी छीन ली उस ख़ुदारा ने दहल तन्हाइयों फिर फिर बहुत उसको पुकारा है  वो जिनके साथ दुःख बांटे भूखों साझा किए थे थाल बिछाकर आज सब बैठे वही शतरंज की सी चाल  यही एक दोष था अपना कि तुझ संग प्रीत हो जाना वो जो कल तक लगे अपने सुनाते पेट भर ताना  ज़माने भीड़ है काफ़ी मग़र तन्हाइयों में टूटते हैं हम तुम भी उस पार तरसे हो बरसे कितना यहां भी हम अक्सर क्यो यहाँ होता कि मोहब्बत जंग बन जाती सताए दिल को क्यो दुनिया और बढ़कर सता जाती ।। प्रियंवदा अवस्थी

छानी है जब से

 छानी है जबसे रेत पर तुमने प्रीत की चाँदी तम घूँटते अजब मन मिठास घुल रही है मौसम बदल रहा है  घन याद तेरी छूकर आँचल की आड़ कोई मोरनी मचल रही है  धरती गगन की आभा रखकर नवल परों पर मोहित मयूर  नयनों से पीर झरझर कोई जीत गढ़ रही है  बरसों से खुश्क धरती यौवन पे रीझ बरबस   प्रियतम की एक चितवन श्रृंगार गढ़ रही है शब्दों से खेलना प्रिय तेरा शौक मेरा शगल है जितने ये बह रहे है उतनी प्यास बढ़ रही है ।। प्रियंवदा©2013

बोनसाई

   प्रेम ,,, तुम्हारी पीड़ा गहरी  समझ आई नही बनानी मुझे रिश्तों की बोनसाई,,,, मन की अनन्त गहराइयों में उतर मौलिकता को कुरेद और कुतर हृदय से हरगिज़ खेल नही सकती , व्योम सी तुम्हारी व्यापकता   जबरन उथले  ठेल नही सकती ऋतुओं संग चढ़े बढ़े तेरी तरुणाई तेरी जंगली प्रवृत्ति सदा है लुभाई नही बनानी मुझे रिश्तों की बोन्साई...... समय के साथ भले ही हैं हो गए  संकुचित से घर औ पथरीले शहर प्रेम की कोमल फुनगियां नोचकर शाखा से शाखा के नही करना स्वार्थ का ऐसा संवरण   मुझे नही बनानी रिश्तों की बोन्साई मुझे नही बनानी रिश्तों की बोन्साई प्रियंवदा अवस्थी

इस सन्नाटे में

इस सन्नाटे में  अजीब सी सुगबुग है किसी की आहट लेती मौसमी धुंध कुछ यूँ चुप है देखा है मैंने  कितनी ही बार पत्तो पत्तों पर धूप को सुनहरी पातियाँ लिखते दिन दिन भर कितने इत्मीनान से  जिन्हें संग लेकर फिसल जाया करती है सांझ..... शाखों से उतर ... रख देती है जाकर ,अंधेरों की आड़  चुराते सबसे नजर ..... मुझसे होकर तुम तक संप्रेषित कितने ही ऐसे तप्त अव्यक्त  अभेजे संदेसो को अब आखर दर आखर पढ़ रही हैं......  सांय सांय करती ये हवाएं..... खामोशियों को सुन सकना तुमसे ही तो सीखा था मैंने याद है न ? वो तुम्हारा हर अनकही को कनखियों से भांप लेना और फिर वो मेरा  नज़रों उथलाता बसन्त  मुंदी पलकों से आँक लेना...... प्रियंवदा अवस्थी©2014

अभेजे सन्देश भूमिका

बस यूं ही......  दिन उगने से लेकर सांझ के आगोश में समा जाने को क्षितिज की मुंडेर पर आकर अटक गया सुर्ख सूरज जाने किस गली किस डगर भटककर ज़मीन का पूरा ताप संताप अपनी झोली में भरकर आहिस्ता आहिस्ता गहरे सागर में उतर जाने को लालायित दिख रहा था । शीतल चंचल लहरों की चादर बार बार खींचकर अपने मुख पर ओढ़कर मानो अब वह निश्चिंतता की नींद सो जाना चाहता था ।  घर से निकलते समय मन में तो यही था कि आज मेरे जेहन की सारी हलचल साथ लाये इन पन्नों पर लिखकर हर्फ हर्फ उसकी ओर बहा दूँ  ।और वह कतरा कतरा इन्हें समेटकर कहीं एकांत में बैठकर लम्हा लम्हा आज सिर्फ और सिर्फ मुझे ही पढ़े ।कंठ तक खट्टे मीठे अनुभवों से लबालब भरी  ज़िंदगी ज़रा सी हल्की और कुछ तो खाली हो जाती । क्योंकि तुम्ही हो जो अक्सर मेरी आँखों मे सहमी नमी को देखकर उलझा हुआ सवाल करते रहे हो बरसों से ।जब जब भी मैनें इस नम रेत पर ठहर अपनी रूखी सूखी सी हथेलियाँ रखी हैं।  मन सदा ही शून्यता की तलाश करता रहता है और जीवन कभी इसे शून्य होने देता है भला? पैमाना ही कुछ ऐसा  गढ़ दिया है संसार की रचना करने वाले ने कि जितने लफ़्ज़ों के साथ बाहर ...

एक तुमसे जुदा होने के बाद

एक तुमसे जुदा होने के बाद  हर एक साँस सज़ा हो गयी यूँ ही साथ साथ चलते  न जाने क्या खता हो गई  कि दिल में हूक उठती है  ये आँखें रोज़ बहती हैं  फिसलती सी कुछ तारीखें तुम्हारी राह तकती हैं कहीं उस पार से तुम भी ये मंज़र तो देखते होंगे कहो कुछ न मग़र दिल की हर एक फरियाद सुनी होगी मैं इस जालिम ज़माने में तुझे अपना ना कह पाई यही ग़र एक खता मेरी सजा खुद मैंने अपनाई  मोहब्बत में ज़रूरी तो नही हर एक बात पूरी हो  और पूरी होने को एक  अदद हासिल ज़रूरी हो ।। प्रियंवदा अवस्थी

ओ रँगरेजा तेरी छुवन सों

रंग डारो वो मोहना जा पै चढ़ै ना दूजो रंग ओ रंगरेजा तेरी छुवन सौंं चढ़ै नशीली भंग ।। अंग अंग पे नाम छपे, खिल खिल उठै पलाश   चितवन ऐसी फेर ,पीर की झरै जरै हर फाँस बहक साँस फगुई चले ठुनक ठुनक नए ढंग  ओ रंगरेजा तेरी छुवन सों चढ़ै नशीली भंग ।।  नेह अबीर लिपट तन निखरे मानस सीझे राग  तेरी लगन नस नस फरके ताल कहरवा आज बिसर काल की चाल यथारथ चलै नवेलो ढंग ओ रंगरेजा तेरी छुवन सों चढ़ै नशीली भंग ।।  नख शिख बिपदा नाप कै नज़र झार दूँ  आग  बिरहा की ठिठुरन मिटै मिलन साजे सोलह सुहाग  लुकछिप बाण चलावे अंग अंग हाय अनंग । ओ रँगरेजा तेरी छुवन सौं चढ़ै नशीली भंग । मिलन दिखावा कबहु न चाहे मन में रासो फाग  अँगना हर ठनगन चलै प्रीतम बाहर भीजै लाज सुर्ख नयन छुए तन पुखराजी सजूँ जोगनी रंग  ओ रंगरेजा तेरी छुवन सों चढ़ै नशीली भंग ।।  प्रियंवदा