बुझती हुई उम्र, और सपने

सुनो प्रिय...
तुम क्या जानो
ये बुझती हुई उम्र ...और
चुलबुले सपनों का बिन बताये
बेतहाशा जवान हो जाना...
और फिर -पानी के बुलबुलों को
हथेली पर सजा, फूँक मारकर
स्वच्छंद आकाश में उड़ा देने की
तमन्नाओं का जाग जाना...
जब भी कभी तुम आदतन ,
दर्पन से दो चार होते ही ,
बेबात ही छेड़ जाते हो
लुप्तप्राय मन-वीणा के तार ,,,,
करवटों पर भले ही फिर
सदियों की चुभनभरी पीड़ाओं ने
रच डाले हों अंतहीन इतिहास,
आँखों बढ़ती चढ़ती खुमारी ,
अलसाये हुए से चेतन और
तन के ढलते हुए वजूद को
विषमताओं की हर दीवारें वेध
एक कशिश भरी आवाज़
कुछ भीतर का कुछ बाहर से....
कतरा कतरा समेटा करती है ....
होता है  मुरझाई पलकों पर
मयूरपंख का सा स्पर्श .....
गुदगुदाती सी मीठी सिहरन,
कब और कैसे विस्मृत
स्मृति के झूले झूलने लगती है ,
एक ढलती हुई रात
अपनी सारी की सारी चांदनी,
बादलों की चादर में लपेट
चाँद को आगोश में समेट लेती है ,,,
कब भोर का सारा सोना
एक चितवन पर निसार जाती है,,
कुछ भी पता नही चलता...
जानते हो न तुम भी ये सब ?
हर रात नींद के आ जाने
और आँखों के जाग जाने का सबब
धरती के किसी एक हिस्से में
चाँद का अंधेरों की आड़ ले
पलकोे को सहलाना,
और किसी दूसरे हिस्से में
उजाले उगलते हुए सूरज का
बेबाक उग जाना ही नही होता...
कई बार ये सिर्फ
तुम्हारे होने और न होने के बीच के
इन अमिट फासलों को मिटाने का
एक खूबसूरत सा
बहाना भी हुआ करता है...
प्रियंवदा अवस्थी

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