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Showing posts from January, 2017

सत्य का रंग श्वेत

सत्य का एक रंग श्वेत ***************** हम सत्य के जितने करीब उतने उज्ज्वल,उतने धवल सत्य का सिर्फ एक रंग "श्वेत" विलीन है जिसमे रंग अनेक मिथ्या है केशों लिप्त ये कालिमा देह के सत्य ने अनवरत ...

सुना कि प्यार अँधा होता है

दिल की आँखों जब वो सब कुछ देख लेता है । कितने मुँह फिर ये सुना कि प्यार अंधा होता है ।। मन से मन की सब समझ चल पड़े इस सफर में इससे बेहतर कभी कोई रिश्ता यहाँ क्या होता है ।। मौसमों क...

याद तेरी आई है

निगाहों धुंध बेहद ही घनी बदली सी छाई है दिल में दस्तक देती फिर नई तन्हाई आई है ।। आब आँखों में भरा औ प्यास कि बुझती नही जाने किस डगर चल करके तेरी याद आई है ।। छलछला उठी है माथे बूंदें सिसकती सी हुई कुछ बरस पड़ने को है ये सांसें हुई पुरवाई है ।। नींद छलती आँख को ख्वाब खलबल कर रहे उँगलियों पर बेचैनियों ने पकडी रोशनाई है ।। करवटों पर शेर मतले चादरों पे मचली ग़ज़ल भीगेे तकियों की कोरों पे दुबकी पड़ी रुबाई है ।। रोग बोले जोग कोई नब्ज़ बहकी टटोलकर उसी दिन से जबसे नज़र तेरी नज़्र से टकराई  है ।। प्रियंवदा अवस्थी©

एक सागर कभी नदी नही लीलता

एक नदी कभी खारी नही होती पर्वतों से ढलकर, धरती पर उतरकर पथज मालिन्य ढोकर भी सागर के प्रेम में घुलकर भी,,, एक सागर कभी नदी नही लीलता वस्तुतः नदी की मृदुल सोच, चिरजीवी जीवेषणा, और अंतहीन मिठास .... स्वतः में समाहित कर उसे निरन्तरता से जोड़ने की आस सागर के हृदय पर भारी होती है,,, कदाचित् वह सृष्टि नियोजन हेतु जीवन की आवृत्ति पुनरावृत्ति का सिद्धांत सिखलाने हेतु हर बार क्रमवार लगातार एक नदी केे पिघलते ही आह्वाहन करने लगता है अपनी विशाल भुजाएं फैलाकर उसे कर्म पथ की नित नवल डगरें सुझाकर कितने भी दोष गिने हों इस संसार ने , सागर के खारेपन में डटा रहता है फिर भी अथक समर्पित अपने कर्मस्थल पर नभ थल के मध्यस्थ, जीवन के क्रम को समझाता धरती और नभ के मध्य कदाचित, त्रिशंकु की भांति लटका सृष्टि के चक्र रण में वह कभी वर्तमान नही पीता वह विषमताओं को पीता है, लील लेता है एक गम्भीर सागर नदी के उच्छ्रंखल होते अहम् को आदि अनादि, पथ प्रशस्त करता है पुनः एक नई नदी के उदगम् को पूर्णता को सम्पूर्णता का सबक सिखलाना चाहता है सागर ताकि दम्भ न हो जाये उसे अपने अस्तित्व क...

मन के तीर बड़ी हलचल

मेरे मन के तीर बड़ी हलचल उम्र खरोच लगाये तन पर स्वांस झकोर स्वरों कम्पन मेरे मन के तीर बड़ी हलचल.... तंगहाल हो रही डगर नित आशाओं की बदल रहा जीवन क्षण क्षण परिभाषा भी जगे स्वप्न आँ...

जरा सम्हल के

वो मेरा बाल स्वप्न,, निश्छल-कोमल-चंचल आँगन की नीम तले कच्ची ज़मीन पर खेलते जाने कब गुलाब चुनने लगा काँटों से उलझ... कब कैशोर हुई उसकी छवि कब गुपचुप सँवरने लगा दुनिया की ओट,,,, नज़र ह...

क्षीर सागर उतर जाना

चाहत की गहराइयाँ नापनी थी उसे शायद,, जो एक बार फिर प्रतीक्षाएँ बाँध गया अमराइयों के ठौर..... झर झर पड़ी कदमों मुरझाये अमलतासों सी वासन्तिक प्रीत अधीर नयनो की कोर.... कब तक खिले रहे...

मैंने कहा प्रेम.....

मैंने कहा - प्रेम उसने कहा पीड़ा मैंने फिर से कहा -प्रेम इस बार वो पूंछ ही बैठा- कैसे? घण्टों बैठी रही मौन हाथ थामे उसका .... फिर पूँछा- अब कहो- प्रेम या पीड़ा... नम आँखों से बोला शायद तुम ...