एक नदी कभी खारी नही होती पर्वतों से ढलकर, धरती पर उतरकर पथज मालिन्य ढोकर भी सागर के प्रेम में घुलकर भी,,, एक सागर कभी नदी नही लीलता वस्तुतः नदी की मृदुल सोच, चिरजीवी जीवेषणा, और अंतहीन मिठास .... स्वतः में समाहित कर उसे निरन्तरता से जोड़ने की आस सागर के हृदय पर भारी होती है,,, कदाचित् वह सृष्टि नियोजन हेतु जीवन की आवृत्ति पुनरावृत्ति का सिद्धांत सिखलाने हेतु हर बार क्रमवार लगातार एक नदी केे पिघलते ही आह्वाहन करने लगता है अपनी विशाल भुजाएं फैलाकर उसे कर्म पथ की नित नवल डगरें सुझाकर कितने भी दोष गिने हों इस संसार ने , सागर के खारेपन में डटा रहता है फिर भी अथक समर्पित अपने कर्मस्थल पर नभ थल के मध्यस्थ, जीवन के क्रम को समझाता धरती और नभ के मध्य कदाचित, त्रिशंकु की भांति लटका सृष्टि के चक्र रण में वह कभी वर्तमान नही पीता वह विषमताओं को पीता है, लील लेता है एक गम्भीर सागर नदी के उच्छ्रंखल होते अहम् को आदि अनादि, पथ प्रशस्त करता है पुनः एक नई नदी के उदगम् को पूर्णता को सम्पूर्णता का सबक सिखलाना चाहता है सागर ताकि दम्भ न हो जाये उसे अपने अस्तित्व क...