मेरे अश्कों को सियाही आज मैं कर लूँ , चलो दिल को ही अब क़लम कर लूँ । ज़ुबाँ कहकर जो अक्सर कह नही पाती, वो हाल-ए-दिल तुुझे मेरे सनम कह लूँ ।। थिरकती नाचती लब पे जो मुस्कान हैं देखी वहीं जलते हुए शोलों से कुछ अंगार रखे हैं । धधक उठते हैं जो अक्सर मेरी आहों से टकराके झुलस कर लफ्ज़ बेवज़ह अबोले ख़ाक होते हैं ।। नज़र झिलमिल मे उतराते तारे जो नज़र आते, वहीं भीगे अधूरे ख्वाब जो खार बन बैठे सँजोया उम्र तक जिनको ज़माने से छुपा करके वो हो छलनी मुंदी पलकों से तड़ीपार होते है।। चेहरे पूनम तराशी है कि दुनिया चौंध की कायल ये भीतर के अंधेरों को बख़ूबी ढाँक है लेती , अदा कहते हैं वो इसको नावाक़िफ़ हकीकत से कयामत जीने के सबके अलग अंदाज़ होते हैं ।। प्रियंवदा अवस्थी