मुझे पलटकर देख लेना अच्छा लगता है कई बार सब कुछ सही करते करते कुछ गलत कर देना अच्छा लगता है ।। ऊब जाते हैं कायदे भी एक लीक पे चलते बात तुम्हारी जब कभी भी आये तो कायदों से भटक ले...
मेरे अश्कों को सियाही आज मैं कर लूँ , चलो दिल को ही अब क़लम कर लूँ । ज़ुबाँ कहकर जो अक्सर कह नही पाती, वो हाल-ए-दिल तुुझे मेरे सनम कह लूँ ।। थिरकती नाचती लब पे जो मुस्कान हैं देखी वहीं जलते हुए शोलों से कुछ अंगार रखे हैं । धधक उठते हैं जो अक्सर मेरी आहों से टकराके झुलस कर लफ्ज़ बेवज़ह अबोले ख़ाक होते हैं ।। नज़र झिलमिल मे उतराते तारे जो नज़र आते, वहीं भीगे अधूरे ख्वाब जो खार बन बैठे सँजोया उम्र तक जिनको ज़माने से छुपा करके वो हो छलनी मुंदी पलकों से तड़ीपार होते है।। चेहरे पूनम तराशी है कि दुनिया चौंध की कायल ये भीतर के अंधेरों को बख़ूबी ढाँक है लेती , अदा कहते हैं वो इसको नावाक़िफ़ हकीकत से कयामत जीने के सबके अलग अंदाज़ होते हैं ।। प्रियंवदा अवस्थी
मत छल अब ओ कारे बदरा झमक झमक कर तू झर जा चमक गरज संग ले फुहार घर आँगन तन मन तर जा।। झुलस रही चौतरफा माटी ठनक गये कुटिया में कुठले चढ़ा ताप भुइँ छोड़ गगन पे असह्य विपत नकुवन चढ़ बोले...
सुनो प्रिय ,,, बहुत तपी हूँ तुम बिन मास दिवस ऋतुएं गिनते हवाओं भेजे सन्देश पढ़ते जलते भुंजते.. जो भेजते रहे जब तब अधरों के सूख जाने पर तन बेजान होने की पाकर ख़बर प्रतीक्षा की अनगि...
सुना है कभी ? सन्नाटे भी बोलते हैं .... कल बरसों से मौन एक सन्नाटा मन की दीवारें तोड़ बेतहाशा चीखने लगा.... तो दूसरा व्याकुल हो तड़पने लगा, शरीर के भीतर ही कहीं .... कुछ सुर में, कुछ बेसुरे ...
एक शाम वो अजीज़ सी,दिल के कितने करीब सी झुकी पलकें गुन रहीं थी,कुछ ज़िन्दगी के साज़ पर तेरी नज़रें आ टिकी तब,एक अंजाम के आगाज़ पर गम लिपट आहों उड़े थे, वो जो सांसों रहे सिमटे हुए तुम खड़...
चितवन चितवन सुर्ख शाम थी धड़कन धड़कन शोर तेरा था पलकों चुनती रात ख्वाहिशें झुके नयन ,,,अहसास तेरा था ।। लहर लहर पर प्रीत लिखी थी गहर गहर कुछ था मन भीतर अँजुरी भर मुस्कान अधर पर क...
सुनो प्रिय,,,, तुम तक पहुंचे मेरे कितने ही मूक सन्देशों तथा मुझमें सम्प्रेषित तुम्हारे उन सैकड़ों उत्तरों में शायद यह सबसे अहम .... दैहिक सत्य के धरातल पर कुछ एक प्रश्नों का भीत...
तुम हाथ छुपाये रंग पिया सब खबर मुझे है तेरे चंचल नैन सधे क्यों हैं सब खबर मुझे है हाथ बटाने को क्यों आतुर भोर भये से कारज मेरे रंग ढंग ये बदला बदला खोल रहे सब ये राज तेरे ऊपर से...
कई बार ऐसा भी होता है ================= दुनिया की अनुभवी नज़रों में अरसे से एक आलिशान जो एक घर था .... गलती से खुली रह गयी खिड़की के भीतर से कल किसी एक मकान सा झांकता दिखा वह विकल.... रेशमी दोहरनुमा प...
फर्क था बहुत,सचमुच,,,,, एकांत में पसरी हुई तन्हाई और भीड़ में कुचली हुई तन्हाई के मध्य, कितनी ही बार एक खोजी मन और दो सरल नयन,,,,, दोनों के ही घण्टों, रह रह कर होते हुए भावनात्मक सम्प्...
तुम आओ तब दीप जलाऊँ जीवन के हर तिमिर भगाऊँ रुच रुच माटी छानी काढ़ी इन हाथों ले प्रिय मैं ठाढ़ी ओ कुम्हार मन की सुन पाओ भ्रमित हुआ ये चाक चलाओ दो हाथों से ना बने दियाली तुम बिन कै...
ज़िन्दगी अब तक तुमने जितने भी रेखाचित्र बनाये सूखी भुरभुरी इस रेत पर.... मिटने नही दिए एक भी मैंने जिस दिन भी चाहो पलटकर देख लेना किसी बन्द मुट्ठी को खोलकर.... कितनी भी फिसलन भरी ...
शब्द तुम जब जब भी निशब्द हुए कितना बोले फिर ह्रदय से लग सचमुच कितने कोमल महसूस की है अक्सर उँगलियों के पोरों पर तुम्हारी निरीह छुवन जब जब भी तुम निशब्द हुए .... तुम्हारे मूक स...
सुनो प्रिय मेरे प्रेम गीतों को सुनते कितनी ही बार तुमको बेमौसम मधुमास बनते देखा मैंने,,,, गज़लों की झील में भीगा सहमा ठिठुरा सा चाँद, कितनी ही बार ठहर सा गया फिर रात के कन्धों प...
दिन उतरे जो कुछ भी शेष है अब अपने पास बरसों बरस का संजोया चलो उसे कुछ आंच देते हैं... कुछ दिन के लिए सही इसे यूँ ही हम ढाँप देते हैं ... फिर किसी एक रोज़ जागेंगे दोनों मुंह अँधेरे ... मथ...
आज बड़े चुप चुप हो दिखते क्या मुझको पाती हो लिखते जो पूंछा तुमसे कईयों ही बार प्रणय क्या देहों का अभिसार।। नयन के मेल देख प्रियतम अकारण जग रिसियता है ये जाने सत्य यहां सब ही ...
मुझे पलटकर देख लेना बहुत अच्छा लगता है बहुत कुछ उठाते रहे हैं वर्षों से कभी कुछ फेंक देना अच्छा लगता है ।। बिखर गए जो अरमां दुपहरी की तपिश सह के अंधेरों की आड़ रख उनको नमी की स...
माँ तुम सब कुछ कैसे जान लेती हो परछाइयों तक के ग़म पहचान लेती हो हथेलियां सुखाती हैं जब भी तपकर किस्मत की कुछ नम लकड़ियाँ हवाओं में घुलकर पलकों बिंधी हर एक नमी एक फूँक में छान ...
रखी मेरी कुछ किताबों में एक वो भी किताब है जिसपे लिखा मेरा नाम, तुम्हारे नाम के बाद है ।। माँ ! मुझे वो सब याद है क्या तुम्हें अब भी याद है ? ये बातें सुन आँखों में फिर एक कहानी घूम ...
उस पार का सूरज ########### बहुत खेले खेल हमने तुमने लुका छिपी के, दिन उगे यहां चलो अब निकलें हम बाहर इस काठ के ताबूत से ,,,, समय खींचने लगा रेखाएं उम्र के माथे पर अपने ताप से,, कुछ तो अब तय कर ल...
निबाहो प्रीत एक सी तुम जरूरी ये नही प्रियतम मेरे आकाश पर तुम चन्द्र की तरह मिला करना । निपट लूँगी अंधेरों से झलक मिलती रहे नित प्रति चले आना किसी पूनम अमावस की व्यथा कहना ।...
पियु लाये चुनरिया लाल पहन मैं उन्हें रिझाऊं नख शिख कर श्रृंगार आज खुद पर इतराऊँ आंगन बैठ तके हैं राह मुखर नैन संग कौतुक भाव चमक उठे हर एक आहट पे कब मैं झलक दिखाऊँ कंगना हार क...
मैक़दे जब भी जाता हूँ तभी मुलाक़ात होती है । एक मेरी अब वहीँ उससे दिल की बात होती है ।। ढूंढते फिरता था जिसको मैं होकर खानाबदोश। वो जिसके वास्ते दिन ही न ही कोई रात होती है ।...