कितनी ही बार
सुनो प्रिय....
कितनी ही बार,,,मेरे तुम्हारे मध्य
उपजी एक स्थिति...
शब्दों का एक जगह आ ठहर
बस यूँ ही ,,,निःशब्द हो जाना
बुन जाना फिर मन में
अनगढ़ से सपनों का ,अजीब सा ताना बाना....
कल यूँ ही अकेले में,
ओढ़नी ओढ़ ली थी मैंने उनकी,,
तुमने भी तो ओढ़े होंगे
ऐसे कितने ही रेशमी ख्याल
अँधेरी उजली रातों में ,,,
कितनी ही बार ,अचेतन ने गढ़े होंगे
भिन्न भिन्न आकार और प्रकार
मेरे तुम्हारे मध्य की सीमाओं के
इस पार...तो कभी उस पार
मूक उन शब्दों के ,स्थायी होते से स्पंदन
मध्य उलझा सा चेतन और अचेतन
छुआ अनछुआ सा इनका आकर्षण
गुजर जाता होगा ,बेख़ौफ़, बेपरवाह
अक्सर ही फिर,,,मेरा और तुम्हारा
क्या कुछ न स्पर्श करते हुए,,,,
प्रियंवदा अवस्थी
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