क्षणिकाएँ

1)
ज़िन्दगी बरसों से प्याज की परतो के बीच ही रही है।*
*जितना तलाशा है उसे उतनी ये आँखें बहती रही है।।*
*सीख लिया तराशना मुँह मोड़ , वक्त के आब भिगो*
*कर लेना जरूरत मुताबिक अब इसकी काट छाँट*
*पकाएंगे जो पकवान अब हम इस माटी की हांडी* 
*मुस्कराकर आपस में,लेंगे आधा आधा हम बाँट ।।*
*प्रियंवदा*

2)

सफ़हा सफ़हा कुछ लिख रहा था*
*वो निगाहों से कुछ इस तरह ,,,,*
*टटोला खुद को जो एक रोज* 
*मैं तो एक पूरी किताब हो गयी* 
* कुछ तो करामात थी ये*
*उसकी मस्त निगाही की*
*कि जिस्म छुआ तक नही* 
और मैं खिलकर गुलाब  हो गयी...*
*प्रियंवदा*

3)

दर्द पिघले बन गए आंसुओं के ज़लज़ले
यूँ भी न हुआ उससे कुछ देर तो साथ चलें
मौसम ए इश्क कितना भी रहा खुश्क मग़र
दिल तो इश्क के सावन में भीगता ही रहा,
उसके मिलने से बिछड़ने तक की हर गली
हर एक रास्ते को दर्द ए अश्क सींचता ही रहा
गवारा नही होगी ख़िज़ाँ ज़िन्दगी को शायद
उसे तो फ़क्त बहारें ही पढ़नी आती हों
क्या मालूम कि इश्क की किस्मत में वो
सिर्फ माशूक का सुलगना ही लिख पाती हो।।

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