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Showing posts from August, 2016

मिल जाते हो गीतों में तुम

मिल जाते हो गीतों में तुम खो जाते एक ग़ज़ल बनकर कब कैसे तुम्हें सहेजूँ अब मैं रह जाओ तुम मेरे बनकर .... किस सुर से तुम्हें सजाऊँ मैं कहो कौन रागिनी गाऊँ मैं शब्दों लूँ आज रिझा तुमक...

एक आस, बहुत वो प्यासी है

अँखियों ऊपर बैठी है जो एक आस बहुत वो प्यासी है लिख देते तुम आंगन सावन ये तनमन आज भिगो लेते ।। भीगी सीझी इन पलकों पर सीले सीले दो स्वप्न बिंधे पुरवा संग जरा लिपट बहते हम इनको त...

वो जब साथ है तो

वो जब साथ है तो अकेले कहाँ हम कि फिर ख्वाब आधे अधूरे कहाँ है। संवरने लगे वो जो निगाहों समाकर जहान में तलाशूं जरूरत कहाँ है।। ज़मीन आसमान चाँद सूरज वही है हर एक शै उसी से उसी से ...

उड़ेगा मान लेकर तब तिरंगा

वतन आज़ाद हो अपना हर कहर और जुल्मों से दुआ चढ़ आसमाँ बरसे भरे सागर नगीनों से तरंगें हों उमंगें हो रहे आज़ाद तन हर मन सुनाई दे न अब कानों कहीं कोई करूण क्रंदन।। सुधा सीझी जुबाने ...

यादों की अगर कहीं बिकवाली हो पाती

जो यादों की अगर कहीं बिकवाली हो पाती तो अपने ग़म की झोली कुछ ख़ाली हो जाती ।। बिक जाती है जहान में तो हर चीज सरेआम बोली भी लगा देते यहां कुछ लोग खुले आम ।। बिकते रहे रिश्ते जा बेघ...

बोलो था वो कौन सा गहना

नयन झुके और बोल गए कम्पित अधरों की भाषा मन पतंग उड़ चला गगन खींचती डोर नई परिभाषा डाल डाल कभी पात पात खिल उठी बसंती धूप सी चपल चक्षु चुम्बन करती तितली एक अति अनूप सी लगा रही सं...

तुम्हारे इश्क़ में

तुम्हारे इश्क में मेरा फ़ना हो जाना मुनासिब था वफ़ा में बेवफाई का सबक मिलना नही भाया ये तेरी एक अदा होगी दिलों से खेल जाने की ढली एक उम्र फिर भी इस तरह न खेलना आया टूटे फूटे खिल...

प्रिय तुम होते जो पास

प्रिय तुम होते जो पास मन मगन मोर बन जाता दिशा चतुर्दिक पियू पियु का शोर गगन तक जाता सुन रथ पर चढ़ आ जाते बादल छा जाते हर छोर तृषा धरा की मिट जाती खिल उठते तन मन पोर कर श्रृंगार ठु...

अब तक न गई आदत तुम्हारी

अब तक न गयी वो आदत तुम्हारी पलक झपकते खुशियाँ चुरा लाने की  तभी तो उस एक दिन, साँझ के जरा सा मुंह मोड़ते ही  भर लाये थे तुम ,मुट्ठी भर सिंदूर और सजा दी थी रात की मांग  चुपके से ,उसक...

क्षणिकाएँ

1) ज़िन्दगी बरसों से प्याज की परतो के बीच ही रही है।* *जितना तलाशा है उसे उतनी ये आँखें बहती रही है।।* *सीख लिया तराशना मुँह मोड़ , वक्त के आब भिगो* *कर लेना जरूरत मुताबिक अब इसकी काट छ...

नही बनानी रिश्तों की बोन्साई

प्रेम ,,, मन की अनन्त गहराइयों में उतर तुम्हारी जड़ों को कुरेद और कुतर तुम्हारी प्रकृति से खेल नही सकती  तुम्हारी नैसर्गिक उन्मुक्तता को जबरन ऊसर में ठेल नही सकती ।। वक्त के ...

कल्पनाओं के शहर में

कल्पनाओं के शहर में अक्सर ही तुम्हारे साथ,,,, बादलों के गलीचे पर लेट हवाओं से अटखेलियां करते, नन्ही नन्ही ख्वाहिशों के सैकड़ों सितारे .... अपनी हथेली में समेट फूंके थे मैंने तु...

यहां कभी ऐसा भी होता है

दुनिया की अनुभवी नज़रों में अरसे से एक आलिशान था जो एक घर ... गलती से खुली रह गयी खिड़की के भीतर से कल किसी एक मकान सा झांकता दिखा वह विकल.... रेशमी दोहरनुमा पर्दे के उस पार,शून्य में ...

अनुभव कभी बहते नही

अहसासों से लबालब भरी हुई ये ज़िन्दगी किसी एक पत्थर की ज़रा सी नादानी से क्यों है इतनी मायूस क्यों आज इतनी बेचैन पुराने से हो गए उसके बस्ते मे परतों में संजोये हुए ताजे बासे स...

एक आगाज़ एक अंजाम

एक शाम वो अजीज़ सी दिल के कितने करीब सी झुकी पलकें गुन रहीं थी कुछ ज़िन्दगी के साज़ पर सुर्ख नज़रें आ टिकी जब एक अंजाम के आगाज़ पर ग़म लिपट आहों उड़े थे जो सांसों रहे सिमटे हुए तुम खड़े...

भीड़ और एकांत की तन्हाई

फर्क था बहुत, सचमुच,,,,, एकांत में पसरी हुई तन्हाई और भीड़ में कुचली हुई तन्हाई में, कितनी ही बार एक खोजी मन और दो सरल नयन,,,,, दोनों के घण्टों, रह रह कर होते भावनात्मक सम्प्रेषण के पर...

तुम्हारे शहर में

तुम्हारे शहर में आज हवाओं का यूँ पहरा होगा एक रूठा हुआ मौसम और दर्द का सहरा होगा कई दिन गए दिल को यहाँ फुरसत मिले शायद कई दिन बाद यादों का बादल फिर गहरा होगा मुड़ के देखना वहीं किसी दरख्त के आस पास कोई इंतज़ार में तेरे अब भी कहीं ठहरा होगा धूप की मार से तुड़ मुड़ गया है जिसका वजूद वो एक गुल उसके गेसू की तरह सुनहरा होगा हर तरफ़ आवाज़ देता है तुझे यादों का मौसम उसे अहसास न था कानों से वक़्त बहरा होगा प्रियंवदा अवस्थी

ए अश्क तू हो जा रिहा

ऐ अश्क हो जा तू रिहा हर दर्द को आज़ाद कर तन खोखला ये हो गया अब रूह मत बर्बाद कर,, तुझे पालते रहे खुशियों गम सदियो किये तुझे जज़्ब हम हर सब्र ओ करार का वास्ता आँखों से झर जा दफ़्अतन,,,, स...

ऋतू तो खेल हवाओं का

नयनों से उसका का टकराना रग रग हरियाली भर जाना मादकता संग ले चली पवन अंग अंग बसंत का खिल जाना सिकुड़े ठिठके कण उठे लहक डालों नव अंकुर पड़े चिटक रस गन्ध सहित झूमा गुलाब इतराई धर...

मिलन मधुर था

मिलन मधुर था,,,,,, कुछ जब हम तुम ढूंढ रहे थे कल धुंधलाई दो आँखों में अश्रु धार थी मौन प्रवण था दो नयनो की मुलाकातों में ,,,,, कजरे गजरे गज़र बिंधे सब कम्पित तनमन रुंधे कंठ तब चंद्रकलाय...

टूटे हुए स्वप्न का दर्द

भोर की किरण के साथ ही उसका बेपरवाह पलको से यकायक फिसल क्या जाना,,, जैसे किसी मासूम बच्चे की भीड़ के रेले झमेले में यकायक अपनो की ऊँगली छूट जाना,,,, भय मिश्रित सिहरन को ढोकर बिस्तर...

कहो तो दिल ज़मीन रख दें

कहो तो दिल ज़मीन रख दें कहो अब आसमा रख दें मोहब्बत में सनम कह दो तो अपनी जां फ़ना कर दें चलेंगे खेल तब तक ये अपने रूठने और मनाने के जब तलक हम तुम्हारी हाँ में अपनी हाँ नही कर दें जल...

एक साँझ फिर मिलना तुम

एक साँझ तुम फिर उसी तरह मिलना मुझे सागर के उस एकांत छोर पर सिर्फ और सिर्फ मेरी प्रतीक्षा करते हुए,,, जहाँ टिमटिम करते से कितने ही टूटे हुए सितारे तेज हवाओं के झोंको से बचा , छुप...

काश मौन को तुम फिर फिर दोहराते

सुनो प्रिय तुम्हारे होने और न होने के मध्य उपजे सन्नाटों का बेलगाम होता हुआ आर्तनाद चीर देना चाहता है जैसे शरीर का अस्तित्व वेध कर रख देना चाहता है समूचा आकाश मिटा देना चा...

कैसा ये रिश्ता अब तक न जाना

कि बार बार लगातार सिर्फ एक ही प्रश्न मेरा मुझसे ही.... कि कौन वो मेरा .. क्या है ये नाता गहरा कि दिखे वो मेरा हो मुझमे ही मेरी हर सीरत से गुज़र मेरी हर सूरत में, ये उसका बार बार छूकर ग...

जब भी कभी पूंछते हो,,,

*सुनो प्रिय* *अनसुलझे बालों पर गुंथी हुई* *मोगरे की इन कलियो ने* *अक्सर ही तुम्हारी खुशबू को* *मुझ तक पहुंचाया है* *जब भी कोई अलबेला सा* *हवा का झोंका मुझसे टकराया है* *अभी कल ही की तो ब...

बुझती हुई उम्र, और सपने

सुनो प्रिय... तुम क्या जानो ये बुझती हुई उम्र ...और चुलबुले सपनों का बिन बताये बेतहाशा जवान हो जाना... और फिर -पानी के बुलबुलों को हथेली पर सजा, फूँक मारकर स्वच्छंद आकाश में उड़ा दे...

जब कोई तृष्णा ही न रही

क्यों रुक नही जाती ये सांसें... क्यों ये दिल अब थम नही जाता क्यों बुझ नही जाती ये आँखें क्यों ये तड़प ये ग़म नही जाता... पड़ी हूँ गुमशुदा सी, उससे बिछड़ अपने ही बसाये एक शहर में, ओ आसमां ...

कि लौट आओ अब तुम....

सूने अँधेरे एक घर में तनहा तनहा एक दिल... अक्सर ही बियाबान रातों को  आँखों के चराग रोशन किये  देखता है बस राह तुम्हारी... तुम जो बरसों बरस पहले  कहकर गये कि अभी आता हूँ  पलट अब तक ...