तुम आओ तब दीप जलाऊँ जीवन के हर तिमिर भगाऊँ रुच रुच माटी छानी काढ़ी इन हाथों ले प्रिय मैं ठाढ़ी ओ कुम्हार मन की सुन पाओ भ्रमित हुआ ये चाक चलाओ दो हाथों से ना बने दियाली तुम बिन कै...
ज़िन्दगी अब तक तुमने जितने भी रेखाचित्र बनाये सूखी भुरभुरी इस रेत पर.... मिटने नही दिए एक भी मैंने जिस दिन भी चाहो पलटकर देख लेना किसी बन्द मुट्ठी को खोलकर.... कितनी भी फिसलन भरी ...
शब्द तुम जब जब भी निशब्द हुए कितना बोले फिर ह्रदय से लग सचमुच कितने कोमल महसूस की है अक्सर उँगलियों के पोरों पर तुम्हारी निरीह छुवन जब जब भी तुम निशब्द हुए .... तुम्हारे मूक स...
सुनो प्रिय मेरे प्रेम गीतों को सुनते कितनी ही बार तुमको बेमौसम मधुमास बनते देखा मैंने,,,, गज़लों की झील में भीगा सहमा ठिठुरा सा चाँद, कितनी ही बार ठहर सा गया फिर रात के कन्धों प...
दिन उतरे जो कुछ भी शेष है अब अपने पास बरसों बरस का संजोया चलो उसे कुछ आंच देते हैं... कुछ दिन के लिए सही इसे यूँ ही हम ढाँप देते हैं ... फिर किसी एक रोज़ जागेंगे दोनों मुंह अँधेरे ... मथ...
आज बड़े चुप चुप हो दिखते क्या मुझको पाती हो लिखते जो पूंछा तुमसे कईयों ही बार प्रणय क्या देहों का अभिसार।। नयन के मेल देख प्रियतम अकारण जग रिसियता है ये जाने सत्य यहां सब ही ...