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Showing posts from 2018

वो मुझको ढूंढ रहा है

फिर मिल गया अचानक वो मुझे .... बालों की उलझी हुई गुथों में ,बेतहाशा उलझा हुआ सा, मचला कुचला कसमसाता,किसी बेजान पत्ते सा..... बड़े दिन हो भी गए थे ,उसे करीने से सँवारे उसकी आँखों में खुद को,जी भरकर निहारे कदाचित वो घर के,उस भण्डार घर की तरह, जहाँ जरूरत गैर जरूरत की ,नयी पुरानी कितनी ही वस्तुएं  रख दी जाती हैं अक्सर ही  बड़े जतन से सहेजकर ... वक्त की गर्द हो या फिर उपेक्षाओं का असहनीय दर्द  सब कुछ सहते हुए भी ,जो बरसों बरस यूँ ही  खामोश पड़ा रहता है दिल को ढाढ़स बंधाये ,एक उपकार की आस लगाये... कई बार ऐसा भी होता है वक़्त के साथ बदल गए ज़िन्दगी के नए से हो गए बाजार में , लाख ढूंढने पर भी जब नही मिलता  आउट डेट से हो गये किसी बेहद प्रिय सामान के कलपुर्जे की तरह .... लौटा देता है खुद कटकर वह उपेक्षित अनायास ही चेहरे पर ,एक चटकीली मुस्कान  महीनों थपथपाता रहता है मन फेर अपनी उष्ण हथेली उसकी गैर नहाईं गर्दीली ,पीठ को साभिमान.... घण्टों सुलझाती रही...

शरद पूनम विशेष

*************** गुजर गए अनगिन पखवारे पर तुम ना आये ऋतु दिन खिल खिल मुरझाए पर तुम ना आये ।। वो शहद भीगी यादें तेरी मन में मिठास भर जाती हैं चूम शरद की सरहद प्रिय मिलन बहुत अकुलाती हैं।। चु...

यादों की फुहारें

#भीगासावन यादों की फुहारों का मिल जाना क्या सफ़र में आभास उस छुवन का सिहरन ठगी बदन में साँसों के थपेड़ों में उलझी वो ही महक थी सावन मिला नहाते मन बीच एक तरण में ।। हाथों की उँगलियों में पीतल का छुपा छल्ला करने लगा सगन घन धरती से हो निठल्ला पलकों की पाट मन को बैठा के साथ बैठा पींगें बढ़ा के संग संग रहा डोलता  गगन में।। संझा की सुर्खियाँ भर सिंदूर नभ सिंधोरे ..... बादल की ओट शशि ने निशि मांग फिर सजाई भीगी चुनर को सर रख झुकते हुए नयन पर रचने लगे प्रणय प्रिय, प्रिया भाव आचमन में।। प्रियंवदा अवस्थी

छत पर मेरे ठहर एक क्षण

छतजब सूरत सी सूरत नही है  तब तो हर वक्त आईना निहारती रहती है जो ऊपरवाला थोड़ी खूबसूरती दे देता तो न जाने क्या करती महारानी। दादी अम्मा की धारदार बातें सुनते ही तन मन मे बहती जवानी की रौ की अबूझ पहेली सुलझाती हुई चंदा का दिल जैसे छन्न सा होकर टूटकर रह गया ।आंखों में छलछलाहट और सामने के आईने में मानो सैकड़ों दरारें पड़ गयी हों और हर एक टुकड़े के उस पार से झांकता हुआ उसका शांत चेहरा सहसा ही ज्यों वीभत्स आकार लेकर उसे ही डराने दहलाने लगा। उसने झट से अपनी आंखें मींच लीं और हम आंखों धड़कते हुए दिल से वह दर्पण से दूर हट गई । सांवली सलोनी सी चंदा , हाँ वो चंदा किन्तु अपनी मृत माँ के दिये नाम से बिल्कुल विपरीत । चन्द्रमा जैसी तो बिल्कुल नही थी वह । शक्ल ओ सूरत में बिल्कुल सामान्य सी दीखती थी, माँ बचपन मे जन्म देते ही गुज़र गयी और बापू जवानी की दहलीज पे कदम रखते ही चल बसे अब ले देकर उसकी बूढ़ी गरीब दादी ही रह गयी थी उसे सम्हालने के लिए। क्रमश:  छत पर मेरे ठहर एक क्षण बादल बरस गया भिगो तप्त तन प्रीत फुहारों देकर मरज गया अता पता मालूम नही जो लिख भेजूं सन्देस गरज़ चमक इठलाता वह अब जाने किधर गया...

उनसे भेंट हुई सावन में

उन से भेंट हुई सावन में नयना चहक उठे आंजन में स्वांस स्वांस संगीत मिलन का घुंघरू झुनक उठे झांझर में कर सोलह सिंगार दृष्टि से होय हरित मन प्रीति वृष्टि से प्रीति डोर गुँथ ली वरमाला सजा मेघ मंडप आंगन में पुष्प लता कलियाँ हरषाई मटक ठुमक पुरवा अंगड़ाई उफ़नाये सब ताल तलैया मोर युगल मदमत नाचन में चढ़ छत पर मुस्काई बरखा स्वेत श्याम का भेद न परखा खेल फुहारों के मतवाले अबकी  पिया लगे सावन में प्रियंवदा अवस्थी

बादलों की चादरों पर

बादलों की चादरों पर फूल रेशम के खिले और तुम हर इक कली नव रंग भरते से मिले ।। क्रूरता वसुधा बसे उगें सैकड़ों कंटक जहाँ । शूल पगतल से हटाकर घाव तुम सिलते मिले।। चाँद की डग पर सितारे रोशनी रख हाथ मे स्याह घर की खिड़कियों से झाँकते तकते मिले।। धरा की धारें नुकीली जो चोट करती चोट पर औ गगन पर रिश्ते नाते संग साथ देते से मिले।। प्रीति की कटुतम परीक्षा स्वप्न में चलती बरस मिलन रचते चक्षु झिलमिल ओटकर झरते मिले ।। प्रियंवदा अवस्थी

एक पाती लिखनी है तुमको

एक पाती लिखनी तुमको क्या आज लिखूँ विरह कहूँ प्रिय या मिलने के हर राज लिखूँ ।। आन मिले जब निपट अँधेरी रात प्रिये सिहर उठा मन स्वेद स्वेद था गात प्रिये हाथ पकड़ते मुखर हुए चौमुख सन्नाटे नयन दर्प तक नयन सिमटती लाज लिखूँ ।। आलिंगित से दृष्टिपात मन गह्वर मंथन भ्रमित चित्त भूला पथ हृद गति के स्पंदन शब्द तालु अटके नस नाड़ी रतिमय नर्तन जम्भित रंध्र रंध्र अनुपम ऋतुराज लिखूँ ।। स्वांस स्वांस फगुवा फूटी अमराई की बौर पात पात मंडराया मधुकर जैसे कोई चोर मदन गंध छुप बैठी अन्तस् हिय पंकज ठौर आखर आखर प्रणय प्रीति पराग लिखूँ ।। प्रियंवदा अवस्थी

देह धर्म के हर उपक्रम से

देह धर्म के हर उपक्रम से धीरे धीरे ऊपर उठकर बुझ जाऊँगी जब मैं प्रियतम तुम तब सहज प्रकट हो जाना अथक यत्न भी दृष्ट नही जो चर्म चक्षु ये धृष्ट नही जो किसी भोर के उग जाने पर इन नयन...

वो बेवफा वक्त के माफिक

आज की हर बात को वो कल पे टालता रहा वो बेवफ़ा वक़्त माफिक वक्त निकालता रहा खुशी नाराज़ी मुहब्बत बात सारी दिल में रख  ज़िन्द की ख़ातिर फ़क़त ज़िन्द निकालता रहा चाहतों की बात मेरी  ज़रुरत उसके ठिकाने इक मुकम्मल होते ही वह दूजी रख जाता रहा ख्वाब नज़रों में जगे कुछ साँझ की सरगोशियों रात की करवट पे जालिम भोर लिख जाता रहा  वक्त की चौपड़ युगों से चौतरफ बिछती रही फर्क़ उसने कब किया कौन आता जाता रहा ।। प्रियंवदा अवस्थी

यूँ मत देख

यूँ मत देख कि झुलसती हूँ बहुत तनिक कभी ओटकर के देख। तपिश हर वक्त ही सही नही होती कभी ओस की तरह झरके देख ।। माना कि बहुत तंग हुई हैे गलियां, जिधर रहते रहे हम बरसों से । कभी चढ़कर खु...

एक सागर

सागर ...वर्तमान कभी नही पीता...... एक नदी कभी खारी नही होती पर्वतों से ढलकर, धरती पर उतरकर पथज मालिन्य ढोकर भी सागर के प्रेम में घुलकर भी,,, एक सागर कभी नदी नही लीलता वस्तुतः नदी की म...

हो जाये जब प्रीति

ह्रदय आकार बदलने लगता है ************************ हो जाये जब प्रीति ह्रदय आकार बदलने लगता है क्या तनमन क्या जीवन सारा संसार बदलने लगता है कल तक हम जो स्वासें लेते थे बस यूँ ही जी लेने को एक ख्याल ...

लिखो तुम अमावस

लिखो तुम अमावस गगन आज प्रियतम ****************************** लिखो तुम अमावस गगन आज प्रियतम मुझे चाह है चाँदनी ओढ़ने की छुपाकर तुम्हें अपने केशों के पीछे ख्वाहिश है कानों में वो बोलने की उजालों न जो ...

कल्पनाओं की कलोल कन्दराओं में

सुनो प्रिय मेरे हर लिखे में अलिखे को समझ कर विचरने लगोगे जिस किसी भी दिन तुम कल्पनाओ की कलोल कन्दराओं के मध्य तराशी हुई जीवनाकृतियों को अपनी उंगलियों के पोरों से हौले से ...

हिंदी किधर गयी

हिंदी किधर गई...... लोग जो तनिक आधुनिक हैं हो रहे दिन चढ़े तक मुँह औंध कर सो रहे पूरब जाने कब सूरज राइज हो गया बदले रँग ढँग देख सरप्राइज हो गया पिता जी मॉडर्न होकर डैड बन गए देववाणी ...

सोंधे स्वप्न

सुनो तुम्हारे गठीलेे बदन के एक एक रोमछिद्रों से टपके हुए स्वेद ने जिस दिन से आलिंगित किया है इस तपती हुई देह की मौन आख्याओ को तकियों की कोरों पर सोंधे से कुछ स्वप्न रतजगे ल...

अब मैं भूलूँ

अब मैं भूलूँ तुम याद लिखो हर इक दिन की फरियाद लिखो क्या छोड़ा कब वह छूट गया क्या तोड़ा और क्यो टूट गया कब दिन जागा इक साँझ ढले किस भोर उगी थी रात लिखो।। अब मैं भूलूँ तुम याद लिखो ......

हिंदी

आँख खुली  देखा ललाट माँ  सजा हुआ था बिंदी से अभिनन्दन करते स्वर निकले अपनी भाषा हिंदी से ।। उम्र बढ़ी सुनते वह लोरी जिन  शब्दों ममता घोली थी फूटे थे जब प्रथम बार इस मुख ने हिं...

जीवन लिपटी जम्हाई में

अल्हड़ बचपन लौट रहा फिर जीवन लिपटी जम्हाई में चक्की चूल्हा खेल रहा मन बस मिट्टी की गहराई में सखा सखी सब ही जुट जाते  चितवन तनिक मचलते ही अंजुरी भर भर खुशियाँ लाते गुप छुप खेल...

आ भी जा

एक शाम वो अजीज़ सी दिल के कितने करीब सी झुकी पलकें गुन रहीं थी धुन कोई एक साज़ पर नज़र तेरी टिक गयी आ उस अंदाज़ ए अंजाम पर दर्द आहों संग उड़े थे साँसों में जो सिमटे रहे तुम खड़े खामोश ...

कहो रीत प्रीत ऐसी कभी तुमने ...

------------------------------------------------ सज कर पियु संग डोली आई  कितने अरमान संग लायी  इक छोर लहू विवश मन बँधी डोर से खिंचती आई यह प्रीत की रीति बनी जग प्रिय तुमने भी कभी निभाई ... इक माटी से दूजी में मिल कुम्हल...

मौन बोलते रहे

नीम की मुंडेर पर ,पीपली की छांव में सांवले सजन तेरे उस हरियाले गाँव मे पात पात लिख गई धूल अम्बु खेलकर प्रीत उग गई जहां साँस की सी मेड़ पर फिर मौन बोलते रहे मौन डोलते रहे ...  जेठ ताप घोर था मन अजब सा शोर था ओढ़नी की कोर बंधी बेरियों का दौर था खन खनक उठी थी कलाई हरी चूड़ियां छुपके लाई जब पवन घुंघरू जड़ी तोड़ियां मौन खौलते रहे....मौन तौलते रहे..... कोई रश्मि मेघ को वेधकर छिटक गयी सप्तरंग घाघरी कटि स्वतः थी सज गई काल की मुंडेर पर  रह रह के हुई गर्जना भीग उठे तप्त तन जब तोड़ सारी वर्जना मौन बोलते रहे मौन डोलते रहे.... प्रियंवदा अवस्थी

ये नैना चार होने दो

नयन से आज ओ प्रियतम नयन ये चार होने दो। कि ये तन आज फिर से प्रेम की बीमार होने दो।। लिखूँ मैं भीगी पाती फिर नमी पलकों कोरों से। कहीं अति दूर फिर से इक हृदय यलगार होने दो ।। हवा ख़ुशबू बटोरे स्वांस संग हलचल करे भीतर अधर बेचैन शब्दों के प्रबल उदगार रहने दो ।। मचलती प्रीति ठुनके डोर पर नील नभ चढ़कर विचलते दो पतंगों की तलब तक़रार होने दो ।। सुखों की धूप पर थोड़ी दुःखों की ओस झरने दो । विरह की ज्वाल से जलते हुए तन को ठिठुरने दो ।। तड़प जीने दो हृद आकुल को घनतम कोहासों की लिहाफों को मिलन स्वप्नों के कुछ श्रृंगार करने दो ।। बदलती ऋतु की डग चलके प्रीति परवान चढ़ती है। समय प्रतिकूल अपनों से अपनी पहचान बढ़ती है।। चलो हम भी धरा नभ से प्रकृति की रीति हर जी लें। पर्व बुनती पवन को अब जिधर बहना है बहने दो ।। प्रियंवदा अवस्थी