वो मुझको ढूंढ रहा है
फिर मिल गया अचानक वो मुझे .... बालों की उलझी हुई गुथों में ,बेतहाशा उलझा हुआ सा, मचला कुचला कसमसाता,किसी बेजान पत्ते सा..... बड़े दिन हो भी गए थे ,उसे करीने से सँवारे उसकी आँखों में खुद को,जी भरकर निहारे कदाचित वो घर के,उस भण्डार घर की तरह, जहाँ जरूरत गैर जरूरत की ,नयी पुरानी कितनी ही वस्तुएं रख दी जाती हैं अक्सर ही बड़े जतन से सहेजकर ... वक्त की गर्द हो या फिर उपेक्षाओं का असहनीय दर्द सब कुछ सहते हुए भी ,जो बरसों बरस यूँ ही खामोश पड़ा रहता है दिल को ढाढ़स बंधाये ,एक उपकार की आस लगाये... कई बार ऐसा भी होता है वक़्त के साथ बदल गए ज़िन्दगी के नए से हो गए बाजार में , लाख ढूंढने पर भी जब नही मिलता आउट डेट से हो गये किसी बेहद प्रिय सामान के कलपुर्जे की तरह .... लौटा देता है खुद कटकर वह उपेक्षित अनायास ही चेहरे पर ,एक चटकीली मुस्कान महीनों थपथपाता रहता है मन फेर अपनी उष्ण हथेली उसकी गैर नहाईं गर्दीली ,पीठ को साभिमान.... घण्टों सुलझाती रही...