किन शब्दो मे तुमको गढ़ लूँ जब जी चाहे तब मैं पढ़ लूँ । बहुत कठिन रस्ते ये प्रियतम स्वांस उलाहन कितना सह लूँ ।। नयन दृष्टि तुम तक जो जाती जग तरकश तीरे खिंच जाती । घोर सबल भीतर तुम कितने किन्तु विवशता झर झर जाती ।। एक विकल्प दो ये पीड़ा हर लूँ शब्द न निकले औ सब कह लूँ ।। अधर मुखरते स्वर हो कम्पित तुम कल्पित तनतरु आच्छादित शाख शाख अँगड़ाते चितवन चबा चुगलियाँ चले चतुर पवन ।। कहो यत्न सुगन्धि यह ढक लूँ । जिक्र ना हो औ तुम तक चल लूँ ।। चले चन्द्रकला सों जीवन अपना घट बढ़ के आवंटित हर सपना।। काल अमावस नहि कोई गणना । और चन्द्रिका चौमुख सुनो बखना ।। धार दुधार रीति यह कुंद कर लूँ । लोक न लोके मिलन मैं रच लूँ ।। प्रियंवदा